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माता-पिता के प्रति शादीशुदा बच्चों के कर्तव्य

 


*माता-पिता के प्रति शादीशुदा बच्चों के कर्तव्य*

*कभी ठहरकर खुद से पूछिए—जब आप दुख और तकलीफ में थे, तब आपके माता-पिता ने क्या किया था और आज आप उनके लिए क्या कर रहे हैं?*

*अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी* 9893354327 

विवाह के बाद जीवन की परिस्थितियां बदलती हैं। नई जिम्मेदारियां आती हैं, पति-पत्नी का अपना संसार बसता है, बच्चों की परवरिश, शिक्षा, नौकरी और भविष्य की चिंता जीवन का हिस्सा बन जाती है। यह सब स्वाभाविक है। लेकिन इन नई जिम्मेदारियों के बीच क्या हम उन माता-पिता को भूल रहे हैं, जिन्होंने हमारे जीवन की नींव रखी?

यह सवाल केवल दूसरों से पूछने का नहीं, बल्कि स्वयं से पूछने का है।

जरा एक पल रुककर सोचिए—जब आप छोटे थे, बीमार होते थे, किसी परेशानी में होते थे या जीवन में असफलता का सामना करते थे, तब आपके माता-पिता आपके लिए क्या करते थे?

क्या उन्होंने आपकी परेशानी देखकर रातों की नींद नहीं गंवाई थी? क्या आपकी बीमारी में आपके पास बैठकर चिंता नहीं की थी? क्या आपकी पढ़ाई, नौकरी और भविष्य के लिए अपनी अनेक इच्छाओं का त्याग नहीं किया था? जब आपको किसी सहारे की जरूरत थी, तब क्या उन्होंने यह पूछा था कि "हमारे पास समय है या नहीं"?

अधिकांश माता-पिता ने अपनी संतान की जरूरत को अपनी जरूरत से पहले रखा। बच्चों की खुशी को अपनी खुशी माना और उनकी परेशानी को अपनी परेशानी समझा।

आज जब वही माता-पिता उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच गए हैं, जहां उन्हें संतान के समय, सहयोग, सम्मान और अपनत्व की आवश्यकता है, तब हमें स्वयं से एक और सवाल पूछना चाहिए—

आज हम उनके साथ क्या कर रहे हैं?

क्या हम उनके लिए समय निकालते हैं? क्या हम उनकी बातें धैर्य से सुनते हैं? क्या उनकी बीमारी और दवाइयों की जानकारी रखते हैं? क्या उनकी आर्थिक और दैनिक जरूरतों को समझते हैं? क्या हम नियमित रूप से उनका हालचाल पूछते हैं? या फिर हमारी व्यस्त जिंदगी में माता-पिता के लिए केवल औपचारिक फोन कॉल और त्योहारों की शुभकामनाएं ही बची हैं?

क्या हमारा व्यवहार माता-पिता के साथ अच्छा है?

यह सवाल कठोर लग सकता है, लेकिन हर शादीशुदा बेटे-बेटी को कभी न कभी अपने मन में इसका उत्तर जरूर तलाशना चाहिए।

विवाह के बाद जीवनसाथी और बच्चों के प्रति जिम्मेदारियां बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन नई जिम्मेदारियां मिलने का अर्थ पुरानी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेना नहीं है। माता-पिता को समय देना, उनका सम्मान करना और आवश्यकता पड़ने पर उनका सहयोग करना पारिवारिक संस्कार का हिस्सा है।

कई बार माता-पिता को बड़ी आर्थिक सहायता से अधिक अपने बच्चों का थोड़ा सा समय चाहिए होता है। वे चाहते हैं कि उनका बेटा या बेटी कुछ देर उनके पास बैठे, उनकी बात सुने, उनकी बीमारी के बारे में पूछे और उन्हें यह एहसास कराए कि वे आज भी परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

माता-पिता हमेशा पैसे नहीं मांगते, कभी-कभी अपनापन मांगते हैं

बुढ़ापे में व्यक्ति की जरूरतें बदल जाती हैं। शरीर कमजोर हो सकता है, सामाजिक दायरा छोटा हो सकता है और अकेलापन बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में संतान का एक फोन, एक मुलाकात, डॉक्टर के पास साथ जाना या कुछ समय साथ बैठना भी माता-पिता के लिए बहुत मायने रखता है।

इसलिए माता-पिता के प्रति कर्तव्य का अर्थ केवल उन्हें पैसे देना नहीं है। सम्मान, समय, सुरक्षा, चिकित्सा सहायता, भावनात्मक सहयोग और निर्णयों में उनकी गरिमा बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

जीवनसाथी और माता-पिता के बीच संतुलन जरूरी

विवाह के बाद सबसे बड़ी चुनौती कई बार माता-पिता और जीवनसाथी के बीच संतुलन बनाने की होती है। लेकिन इसका समाधान किसी एक रिश्ते की उपेक्षा करना नहीं है।

पति-पत्नी को एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हुए माता-पिता के प्रति सम्मान बनाए रखना चाहिए। वहीं माता-पिता को भी अपने विवाहित बच्चों के वैवाहिक जीवन की स्वतंत्रता और परिस्थितियों का सम्मान करना चाहिए।

परिवार तब मजबूत होता है जब रिश्तों में अधिकार से अधिक संवाद और अपेक्षाओं से अधिक समझ होती है।

बेटा ही नहीं, बेटी भी माता-पिता की संतान है

बदलते समाज में यह सोच भी बदल रही है कि माता-पिता की जिम्मेदारी केवल बेटे की होती है। बेटी भी माता-पिता की संतान है और अपनी परिस्थितियों एवं सामर्थ्य के अनुसार उनके प्रति प्रेम, सम्मान और सहयोग का दायित्व निभा सकती है।

माता-पिता के लिए सबसे बड़ी खुशी अक्सर यह होती है कि उनकी संतान चाहे जहां रहे, लेकिन उन्हें भूले नहीं।

आज अपने बच्चों के बारे में भी सोचिए

इस विषय का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न शायद यही है—

आप अपने बच्चों से भविष्य में क्या उम्मीद रखते हैं?

क्या आप चाहते हैं कि आपके बच्चे बड़े होकर आपकी चिंता करें? बीमारी में आपके साथ रहें? आपकी बात सुनें? आपको सम्मान दें? अकेलेपन में आपका साथ दें? आपकी जरूरत के समय आपके पास खड़े हों?

यदि इन सवालों का उत्तर "हां" है, तो एक और सवाल स्वयं से पूछना होगा—

क्या आज आप अपने माता-पिता के साथ वैसा ही व्यवहार कर रहे हैं, जैसा व्यवहार आप कल अपने बच्चों से चाहते हैं?

बच्चे केवल हमारी बातें सुनकर संस्कार नहीं सीखते, वे हमारे व्यवहार को देखकर सीखते हैं। यदि वे आज देखते हैं कि हम अपने वृद्ध माता-पिता का सम्मान करते हैं, उनकी सहायता करते हैं और उनके लिए समय निकालते हैं, तो उनके मन में भी परिवार और बुजुर्गों के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है।

कल जब हम स्वयं वृद्ध होंगे, तो हमारे बच्चे हमारे साथ कैसा व्यवहार करेंगे, इसकी नींव कहीं न कहीं आज हमारे व्यवहार में ही रखी जा रही है।

माता-पिता बोझ नहीं, हमारी जीवन-यात्रा की जड़ हैं

आधुनिक जीवन में संयुक्त परिवारों का स्वरूप बदल रहा है। बच्चे पढ़ाई और रोजगार के लिए दूसरे शहरों या देशों में चले जाते हैं। अलग रहना हमेशा गलत नहीं है। परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। लेकिन दूरी को उपेक्षा का कारण बनाना उचित नहीं है।

यदि साथ रहना संभव नहीं है तो नियमित फोन किया जा सकता है, वीडियो कॉल की जा सकती है, उनकी चिकित्सा और आर्थिक आवश्यकताओं की व्यवस्था की जा सकती है और समय-समय पर उनसे मिलने का प्रयास किया जा सकता है।

माता-पिता की सेवा का अर्थ हमेशा उनके साथ एक ही घर में रहना नहीं है। उनकी जरूरत के समय उनके साथ खड़ा होना ही वास्तविक बात है।

एक बार अपने अतीत और भविष्य दोनों को देखिए

कभी अपने बचपन को याद कीजिए। जब आप चलना नहीं जानते थे, उन्होंने आपका हाथ पकड़ा। जब आप बोलना नहीं जानते थे, उन्होंने आपकी बात समझी। जब आप गिरते थे, उन्होंने उठाया। जब आप असफल हुए, उन्होंने हौसला दिया। जब दुनिया ने आपको नकारा, तब भी माता-पिता ने आपको स्वीकार किया।

आज यदि उनके कदम लड़खड़ा रहे हैं, तो क्या हमारा हाथ उनके लिए आगे नहीं बढ़ना चाहिए?

आज यदि उन्हें किसी की बात सुनने की जरूरत है, तो क्या हमारे पास उनके लिए कुछ समय नहीं होना चाहिए?

आज यदि वे हमारी ओर उम्मीद से देखते हैं, तो क्या हमें यह याद नहीं करना चाहिए कि कभी हम भी उनकी ओर उम्मीद से देखते थे?

अंत में खुद से कुछ सवाल

हर शादीशुदा व्यक्ति को समय-समय पर अपने आप से कुछ सवाल जरूर पूछने चाहिए—

जब मैं दुख और तकलीफ में था, तब मेरे माता-पिता ने मेरे लिए क्या किया था?

आज मैं उनके दुख और तकलीफ में उनके लिए क्या कर रहा हूं?

क्या मेरा वर्तमान व्यवहार उनके साथ वास्तव में वैसा ही है, जैसा एक संतान को उनके साथ करना चाहिए?

क्या मेरी व्यस्तता इतनी बड़ी है कि मेरे माता-पिता के लिए मेरे पास समय ही नहीं है?

यदि कल मेरे बच्चे मेरे साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा मैं आज अपने माता-पिता के साथ कर रहा हूं, तो क्या मुझे वह व्यवहार स्वीकार होगा?

इन प्रश्नों का उत्तर किसी और को नहीं देना है। उत्तर हमें स्वयं अपने अंतर्मन को देना है।

माता-पिता के प्रति सम्मान केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि हमारी मानवीय जिम्मेदारी है। विवाह के बाद परिवार बढ़ता है, रिश्ते कम नहीं होते। जीवनसाथी और बच्चों के प्रति जिम्मेदारी निभाते हुए माता-पिता के प्रति कर्तव्य को भी जीवित रखना ही संतुलित और संवेदनशील पारिवारिक जीवन की पहचान है।

आज माता-पिता के लिए जो समय हमारे पास है, वही सबसे मूल्यवान है। क्योंकि समय बीत जाने के बाद पछतावा तो रह सकता है, लेकिन बीता हुआ समय वापस नहीं आता।

और शायद सबसे बड़ा सवाल यही है—

जिस प्यार, सुरक्षा और सम्मान की उम्मीद हम अपने बच्चों से अपने बुढ़ापे में करते हैं, क्या वही प्यार, सुरक्षा और सम्मान हम आज अपने माता-पिता को दे रहे हैं?

अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी 

जिला एवं सत्र न्यायालय रायपुर छत्तीसगढ़ 

9893354327