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पुलिसकर्मियों के मानवाधिकार : वर्दी के भीतर के इंसान की गरिमा, श्रम और सेवा-अधिकार
— Advocate D.P. Joshi
पुलिस बल किसी भी लोकतांत्रिक राज्य की कानून-व्यवस्था की आधारशिला है। अपराध नियंत्रण, नागरिकों की सुरक्षा, सार्वजनिक शांति, आपदा प्रबंधन, चुनाव ड्यूटी, वीआईपी सुरक्षा और आकस्मिक परिस्थितियों में पुलिसकर्मी सबसे पहले मोर्चे पर दिखाई देता है। वह अपनी व्यक्तिगत सुविधा, नींद, परिवार और कई बार अपने जीवन तक को जोखिम में डालकर राज्य और समाज के प्रति कर्तव्य निभाता है। लेकिन लोकतंत्र के सामने एक गंभीर प्रश्न है—“जो पुलिसकर्मी नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा करता है, उसके अपने मानवाधिकारों की रक्षा कौन करेगा?” पुलिसकर्मी की वर्दी उसके कर्तव्य को विशेष बनाती है, लेकिन उसे मानव होने के अधिकार से वंचित नहीं करती।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 समानता, अनुच्छेद 16 लोक रोजगार में समान अवसर और अनुच्छेद 21 जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा का संवैधानिक आधार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि जीवन का अर्थ मात्र जीवित रहना नहीं, बल्कि गरिमा, स्वास्थ्य, आजीविका और मानवीय परिस्थितियों के साथ जीवन जीना भी है। Olga Tellis v. Bombay Municipal Corporation में सर्वोच्च न्यायालय ने आजीविका को जीवन के अधिकार से जोड़ा, जबकि Consumer Education & Research Centre v. Union of India में श्रमिकों के स्वास्थ्य और सुरक्षित कार्य-परिस्थितियों को गरिमापूर्ण जीवन के संवैधानिक अधिकार से संबद्ध माना गया। इन सिद्धांतों की रोशनी में पुलिसकर्मी की सेवा-स्थितियों को भी केवल विभागीय प्रशासन का विषय मानकर नहीं छोड़ा जा सकता।
पुलिस सेवा की प्रकृति सामान्य कार्यालयीन नौकरी से अलग है। कानून-व्यवस्था की गंभीर स्थिति, दंगा, चुनाव, त्योहार, वीआईपी ड्यूटी, प्राकृतिक आपदा या किसी आकस्मिक परिस्थिति में पुलिसकर्मी से निर्धारित समय से अधिक कार्य लेना आवश्यक हो सकता है। किंतु असाधारण परिस्थितियों को स्थायी कार्य-संस्कृति बना देना उचित नहीं कहा जा सकता। यदि कोई पुलिसकर्मी लगातार लंबे समय तक ड्यूटी करता है, पर्याप्त नींद और विश्राम से वंचित रहता है तथा नियमित साप्ताहिक अवकाश नहीं ले पाता, तो उसका प्रभाव केवल उसके निजी जीवन पर नहीं पड़ता, बल्कि उसकी शारीरिक क्षमता, मानसिक संतुलन और निर्णय लेने की क्षमता पर भी पड़ सकता है। इसलिए पुलिस बल के लिए ड्यूटी घंटों का वैज्ञानिक निर्धारण, वास्तविक ड्यूटी का रिकॉर्ड, पर्याप्त विश्राम तथा लगातार अत्यधिक ड्यूटी की स्थिति में COMPENSATORY REST जैसी व्यवस्थाओं पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। क्योंकि “पुलिसकर्मी को आराम देना पुलिस की कार्यक्षमता कम करना नहीं, बल्कि उसे बढ़ाना है।“
पुलिसकर्मी का स्वास्थ्य भी उसकी सेवा-शर्तों का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। पुलिस सेवा में शारीरिक जोखिम के साथ-साथ मानसिक दबाव भी अत्यधिक होता है। अपराधियों से मुठभेड़, हिंसक भीड़, दुर्घटनाएं, लगातार तनाव, अनियमित भोजन और नींद की कमी जैसी परिस्थितियां उसके स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वास्थ्य को गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार से जोड़ते हुए यह स्पष्ट किया है कि कार्यरत व्यक्ति के स्वास्थ्य और सुरक्षित कार्य-परिस्थितियों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए पुलिस बल में नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, पर्याप्त चिकित्सा सुविधा और उम्र तथा कार्यक्षमता के अनुरूप ड्यूटी निर्धारण को सेवा-प्रशासन का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
पुलिसकर्मी के वेतन का प्रश्न भी उसके मानवाधिकार और सम्मानजनक जीवन से जुड़ा हुआ है। पुलिसकर्मी केवल निर्धारित घंटे काम करने वाला कर्मचारी नहीं है। उसके कार्य में जीवन का जोखिम, कानूनन उत्तरदायित्व, मानसिक तनाव, कठिन परिस्थितियों में कार्य, विशेष प्रशिक्षण और सार्वजनिक सुरक्षा की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी शामिल होती है। सर्वोच्च न्यायालय ने Randhir Singh v. Union of India में “Equal Pay for Equal Work” को संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 तथा नीति-निर्देशक तत्वों के संदर्भ में महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत के रूप में स्वीकार किया। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक पुलिसकर्मी स्वतः किसी अन्य विभाग के कर्मचारी के समान वेतन का अधिकारी हो जाता है, लेकिन यह अवश्य सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि वेतन एवं भत्तों में किया गया वर्गीकरण वस्तुनिष्ठ, तार्किक और नियमसम्मत हो तथा समान प्रकृति, योग्यता, जिम्मेदारी और कार्य-मूल्य वाले मामलों में अनुचित असमानता न हो। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के Equal Pay for Equal Work आदेश के बावजूद आज तक State Armed Force के जवानों और पुलिस लाइन में तैनात जवानों को रिस्पोंस भत्ता नहीं दिया जा रहा है और अनुसूचित क्षेत्र के बाहर तैनात जवानों को राशन भत्ता प्रदान नहीं किया जा रहा है ।
पुलिसकर्मी के लिए पदोन्नति केवल पद परिवर्तन नहीं है। यह उसके वर्षों के अनुभव, आर्थिक भविष्य, सामाजिक सम्मान और सेवा-जीवन की प्रगति से जुड़ा विषय है। इसलिए पुलिस बल में पर्याप्त promotional avenues, स्पष्ट पात्रता, वरिष्ठता और योग्यता के निर्धारित मानदंड तथा पारदर्शी पदोन्नति प्रक्रिया आवश्यक है। इसलिए “पुलिस बल में एक निर्धारित सेवा अवधि के पश्चात अनिवार्य रूप से पदोन्नति दिए जाने का प्रावधान होना चाहिए।“ संविधान का अनुच्छेद 16 सरकारी रोजगार में समान अवसर का आधार प्रदान करता है। यदि किसी कैडर व्यवस्था, पद संरचना अथवा प्रशासनिक नीति के कारण समान परिस्थितियों में कार्यरत कर्मचारियों के पदोन्नति अवसरों में असंगत अंतर उत्पन्न होता है, तो उसकी निष्पक्ष और विधिसम्मत समीक्षा आवश्यक हो जाती है।
पुलिस के लिए “State Armed Force से जिला कार्यपालिक बल (District Executive Force) Posting: विनियम 158 का प्रभावी क्रियान्वयन और पुलिसकर्मी का सेवा-अधिकार” अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। उपलब्ध मध्यप्रदेश/छत्तीसगढ़ पुलिस विनियम में विनियम 158 — “शारीरिक योग्यता” विशेष सशस्त्र बल के सदस्यों के संबंध में महत्वपूर्ण व्यवस्था करता है। इस प्रावधान के अनुसार “विशेष सशस्त्र बल में कार्यरत मुख्य आरक्षक अथवा आरक्षक के 45 वर्ष की आयु पूर्ण होने के बाद उसे जिला पुलिस में स्थानांतरित किए जाने की व्यवस्था है।“ इसी प्रकार यदि कोई सदस्य कम आयु में ही विशेष सशस्त्र बल के श्रमसाध्य कार्य के लिए शारीरिक रूप से अयोग्य हो जाए, तो उसे भी जिला पुलिस में स्थानांतरित किए जाने का प्रावधान है।
विनियम 158 को केवल स्थानांतरण संबंधी तकनीकी प्रावधान के रूप में देखना उसके मूल उद्देश्य को सीमित कर देगा। इस व्यवस्था के पीछे स्पष्ट रूप से ऐसा प्रशासनिक और मानवीय दृष्टिकोण दिखाई देता है जिसमें बढ़ती आयु अथवा शारीरिक क्षमता में कमी के साथ पुलिसकर्मी को अपेक्षाकृत उपयुक्त कार्य-परिस्थिति उपलब्ध कराई जा सके। इसलिए वास्तविक प्रश्न केवल यह नहीं है कि 45 वर्ष की आयु के बाद State Armed Force के जवान को जिला कार्यपालिक बल (District Executive Force) में भेजा जा सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि विनियम 158 को उसके उद्देश्य के अनुरूप प्रभावी, समयबद्ध और समान रूप से लागू किया जा रहा है या नहीं। यदि कोई कल्याणकारी प्रावधान पुलिसकर्मी की आयु और शारीरिक क्षमता को ध्यान में रखकर बनाया गया है, तो उसका लाभ केवल सरकारी अभिलेखों में दर्ज रहना पर्याप्त नहीं है। नियम की सार्थकता तभी है जब वह संबंधित पुलिसकर्मी को वास्तविक और समय पर लाभ प्रदान करे। State Armed Force के मामले में यह विषय और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। State Armed Force में वर्षों तक कठिन और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में सेवा देने वाले जवानों के लिए 45 वर्ष की आयु के बाद सेवा की प्रकृति और शारीरिक क्षमता के बीच संतुलन आवश्यक है। ऐसे पुलिसकर्मी को नियम के अनुरूप District Executive Force में पदस्थापित किया जाना किसी प्रकार की प्रशासनिक कृपा नहीं, बल्कि लागू विनियम की व्यवस्था के अनुरूप सेवा-प्रशासन का विषय है। इस प्रक्रिया में यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि स्थानांतरण के कारण उसकी सेवा-निरंतरता, वेतन, वरिष्ठता अथवा वैध पदोन्नति-अवसर अनावश्यक रूप से प्रभावित न हों। आपके उपलब्ध पुलिस विनियम में भी संबंधित सेवा-व्यवस्था के संदर्भ में जिला पुलिस और विशेष सशस्त्र बल के बीच विभिन्न सेवा मामलों के लिए लागू नियमों का उल्लेख मिलता है। State Armed Force के जवानों की बेहतरी ही नहीं बल्कि संवेदनशील पुलिसिंग के लिए आवश्यक है कि “District Executive Force में सीधी भर्ती पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाते हुए संयुक्त भर्ती प्रक्रिया अपनाया जावे तथा पुलिस बल में न्यूनतम 10 वर्ष सेवा के बाद ही District Executive Force में पदस्थापना दी जानी चाहिए।“
पुलिसकर्मी का पारिवारिक जीवन भी उसके मानवीय अधिकारों की व्यापक अवधारणा से अलग नहीं किया जा सकता। अनियमित ड्यूटी, लगातार स्थानांतरण, दूरस्थ पदस्थापना और त्योहारों तथा पारिवारिक अवसरों पर अनुपस्थिति का प्रभाव उसके परिवार पर भी पड़ता है। जहां प्रशासनिक आवश्यकता अनुमति दे, वहां मानवीय आधार पर पोस्टिंग, लंबे समय से दूरस्थ क्षेत्रों में सेवा कर रहे जवानों का संतुलित रोटेशन और उम्रदराज पुलिसकर्मियों के लिए अधिक उपयुक्त कार्य-व्यवस्था जैसी नीतियों पर विचार किया जाना चाहिए। पुलिसकर्मी के परिवार को उसकी सेवा का प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ भले ही मिलता हो, लेकिन उसकी कठिन ड्यूटी का सामाजिक और पारिवारिक भार परिवार भी उठाता है। इसी परिपेक्ष्य में देखें तो पुलिस विभाग के लिपिकीय संवर्ग में तैनात जवानों को एक ही जिला अथवा बटालियन में लम्बे दिनों तक पदस्थ रखा जा रहा है, जिससे इन संवर्ग के पुलिसकर्मी की कार्यक्षमता में विकास नहीं हो पा रही है।
पुलिस सुधार की चर्चा लंबे समय से नागरिकों के अधिकार, पुलिस की जवाबदेही और कानून-व्यवस्था के संदर्भ में होती रही है। यह आवश्यक है, लेकिन पुलिस सुधार का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्वयं पुलिसकर्मी का कल्याण और सेवा-अधिकार भी होना चाहिए। Prakash Singh v. Union of India में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस सुधारों को संस्थागत रूप देने के लिए महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए और Police Establishment Board जैसी व्यवस्था के माध्यम से स्थानांतरण, पदस्थापना तथा सेवा-संबंधी निर्णयों में संस्थागत प्रक्रिया और पारदर्शिता पर जोर दिया। इसका व्यापक संदेश यह है कि एक पेशेवर पुलिस बल के लिए पेशेवर और न्यायपूर्ण सेवा-प्रशासन भी आवश्यक है।
श्रम कानूनों के संदर्भ में भी पुलिस सेवा की विशिष्ट प्रकृति को ध्यान में रखना होगा। पुलिसकर्मी को सामान्य औद्योगिक श्रमिक मानकर प्रत्येक श्रम-कानून को सीधे लागू करना विधिक रूप से उचित नहीं होगा। फिर भी श्रम कानूनों के पीछे निहित कल्याणकारी दर्शन—जैसे उचित कार्य-परिस्थितियां, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा, विश्राम, उचित पारिश्रमिक और मानवीय कार्य-व्यवस्था—आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण मूल्य हैं। पुलिस सेवा के लिए इन्हें उसके विशेष स्वरूप के अनुरूप सेवा नियमों, पुलिस विनियमों, विभागीय आदेशों और संवैधानिक गारंटियों के माध्यम से प्रभावी बनाया जाना चाहिए। अर्थात् पुलिसकर्मी को औद्योगिक श्रमिक मानना आवश्यक नहीं है, लेकिन उसे मानवीय कार्य-परिस्थितियों से वंचित करना भी उचित नहीं ठहराया जा सकता।
अब समय आ गया है कि पुलिस बल के जवानों की सेवा-स्थितियों को केवल प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से नहीं, बल्कि मानव गरिमा और संवैधानिक अधिकारों की दृष्टि से देखा जाए। ड्यूटी घंटों का वैज्ञानिक निर्धारण हो, पर्याप्त विश्राम मिले, पुलिसकर्मियों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाए, जोखिम और जिम्मेदारी के अनुरूप वेतन एवं भत्तों की समीक्षा होती रहे, पदोन्नति के पर्याप्त अवसर उपलब्ध हों, स्थानांतरण और पदस्थापना में पारदर्शिता हो तथा विनियम 158 जैसे कल्याणकारी प्रावधानों का वास्तविक और प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।
अंततः यह समझना होगा कि पुलिसकर्मी राज्य की शक्ति का केवल साधन नहीं है। वह स्वयं संविधान द्वारा संरक्षित गरिमा, अधिकार और मानवीय संवेदनाओं वाला नागरिक है। उससे अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी और जोखिम उठाने की अपेक्षा करना राज्य का अधिकार है, लेकिन उसके बदले उसे सम्मानजनक सेवा-परिस्थितियां, पर्याप्त विश्राम, स्वास्थ्य-सुरक्षा, उचित पारिश्रमिक, समान अवसर और न्यायपूर्ण प्रशासन उपलब्ध कराना राज्य का दायित्व भी है।
“पुलिसकर्मी के मानवाधिकार की रक्षा पुलिस व्यवस्था को कमजोर नहीं करती; बल्कि उसे अधिक स्वस्थ, सक्षम, निष्पक्ष, उत्तरदायी और मानवीय बनाती है।“ क्योंकि जो पुलिसकर्मी स्वयं न्यायपूर्ण और मानवीय व्यवस्था का अनुभव करता है, वही समाज में कानून और मानवाधिकारों की रक्षा को अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकता है।
(डी. पी. जोशी)
अधिवक्ता, सेशन कोर्ट, रायपुर, छत्तीसगढ़
