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lआपराधिक मामला दर्ज होने पर क्या करें और क्या न करें? जानिए अपने कानूनी अधिकार


 



आपराधिक मामला दर्ज होने पर क्या करें और क्या न करें? जानिए अपने कानूनी अधिकार

लेखक: अधिवक्ता डी. पी. जोशी, रायपुर, छत्तीसगढ़

विषय: Criminal Law, FIR, Arrest, Bail and Legal Rights in India

जब किसी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज होता है, तो वह और उसका परिवार अक्सर मानसिक तनाव, सामाजिक दबाव और कानूनी अनिश्चितता का सामना करते हैं। ऐसी स्थिति में घबराकर कोई कदम उठाने के बजाय कानून के अनुसार कार्य करना आवश्यक है।


भारत में प्रत्येक व्यक्ति को संविधान और लागू आपराधिक कानूनों के अंतर्गत विभिन्न अधिकार प्राप्त हैं। FIR दर्ज होना अपने आप में अपराध सिद्ध होना नहीं है। किसी व्यक्ति का दोष न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर निर्धारित किया जाता है।


इस लेख में अधिवक्ता डी. पी. जोशी, रायपुर, छत्तीसगढ़ द्वारा सामान्य जानकारी दी जा रही है कि आपराधिक मामला दर्ज होने पर व्यक्ति को क्या करना चाहिए, किन गलतियों से बचना चाहिए और जमानत तथा कानूनी सहायता के लिए कौन-से विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं।


1. FIR दर्ज होने पर सबसे पहले क्या करें?

यदि आपके विरुद्ध FIR दर्ज हुई है या पुलिस आपसे किसी मामले में पूछताछ करना चाहती है, तो सबसे पहले मामले की प्रकृति और कानूनी स्थिति समझें।


आपको निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:


FIR या शिकायत की उपलब्ध प्रति प्राप्त करने का प्रयास करें।

अपराध में लगाए गए आरोपों और संबंधित धाराओं की जानकारी लें।

आपराधिक मामलों का अनुभव रखने वाले अधिवक्ता से सलाह लें।

पुलिस द्वारा भेजे गए वैध नोटिस को नजरअंदाज न करें।

मामले से संबंधित संदेश, दस्तावेज, बिल, CCTV रिकॉर्डिंग और अन्य प्रासंगिक सामग्री सुरक्षित रखें।

किसी भी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से पहले उसकी प्रकृति और कानूनी प्रभाव समझें।

महत्वपूर्ण: केवल FIR दर्ज होने के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता। मामले का परिणाम साक्ष्यों, गवाहों, कानूनी प्रावधानों और न्यायालय के मूल्यांकन पर निर्भर करता है।


2. पुलिस का नोटिस मिलने पर क्या करें?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 35 कुछ परिस्थितियों में गिरफ्तारी के स्थान पर पुलिस द्वारा उपस्थित होने का नोटिस देने की व्यवस्था करती है।


यदि पुलिस आपको नोटिस जारी करती है, तो:


नोटिस में उल्लिखित तारीख, समय और स्थान ध्यान से पढ़ें।

अधिवक्ता से यह समझें कि नोटिस किस कानूनी प्रावधान के अंतर्गत जारी किया गया है।

लागू कानून के अनुसार उपस्थित होने की जिम्मेदारी का पालन करें।

यदि किसी वास्तविक कारण से उपस्थित होना संभव न हो, तो अधिवक्ता की सहायता से उचित कानूनी कदम उठाएं।

यह न मानें कि नोटिस मिलने का अर्थ हर परिस्थिति में गिरफ्तारी से पूर्ण सुरक्षा है।

गिरफ्तारी आवश्यक है या नहीं, इसका निर्धारण मामले के तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के अनुसार किया जाता है।


3. गिरफ्तारी होने पर व्यक्ति के क्या अधिकार हैं?

गिरफ्तारी की स्थिति में व्यक्ति को अपने कानूनी अधिकारों की जानकारी होना आवश्यक है।


परिस्थितियों और लागू कानून के अधीन प्रमुख अधिकारों में शामिल हैं:


गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार।

अपनी पसंद के अधिवक्ता से कानूनी सलाह लेने का अधिकार।

संविधान के अनुच्छेद 22 और लागू प्रक्रिया के अनुसार गिरफ्तारी से संबंधित सुरक्षा प्राप्त करने का अधिकार।

कानून के अनुसार निर्धारित समय के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किए जाने का अधिकार।

लागू कानूनी शर्तों के अधीन जमानत के लिए आवेदन करने का अधिकार।

अपने विरुद्ध अपराध स्वीकार करने के लिए अवैध दबाव या जबरदस्ती से संरक्षण प्राप्त करना।

संविधान का अनुच्छेद 20(3) किसी आरोपी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए बाध्य किए जाने से संरक्षण प्रदान करता है।


गिरफ्तारी के बाद परिवार को चाहिए कि वह गिरफ्तारी से संबंधित जानकारी प्राप्त करे, अधिवक्ता से संपर्क करे और मामले के अनुसार उचित कानूनी उपाय अपनाए।


4. क्या FIR दर्ज होने के बाद अग्रिम जमानत मिल सकती है?

कुछ मामलों में गिरफ्तारी से पहले अग्रिम जमानत के लिए आवेदन किया जा सकता है।


भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 482 अग्रिम जमानत से संबंधित प्रावधान करती है। इसके अंतर्गत सक्षम न्यायालय मामले के तथ्यों, आरोपों की प्रकृति और अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों पर विचार करता है।


अग्रिम जमानत प्रत्येक अपराध में स्वतः उपलब्ध नहीं होती। संबंधित कानून में प्रतिबंध हो सकते हैं और कुछ विशेष अधिनियमों के अंतर्गत अतिरिक्त शर्तें लागू हो सकती हैं।


इसलिए अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने से पहले यह समझना आवश्यक है कि:


आरोप किस अपराध से संबंधित हैं।

अपराध जमानती है या गैर-जमानती।

किसी विशेष अधिनियम के अंतर्गत अतिरिक्त प्रतिबंध लागू हैं या नहीं।

संबंधित न्यायालय के समक्ष कौन-से तथ्य और दस्तावेज प्रस्तुत किए जाने चाहिए।

5. जमानती और गैर-जमानती अपराध में क्या अंतर है?

जमानती अपराध: ऐसे अपराध में कानून के अनुसार निर्धारित शर्तें पूरी होने पर जमानत प्राप्त करना अधिकार के रूप में उपलब्ध हो सकता है।


गैर-जमानती अपराध: ऐसे अपराध में जमानत स्वतः अधिकार के रूप में उपलब्ध नहीं होती। सक्षम न्यायालय मामले के तथ्यों और लागू कानून के आधार पर जमानत पर विचार करता है।


गैर-जमानती अपराध का अर्थ यह नहीं है कि जमानत कभी मिल ही नहीं सकती। जमानत की संभावना आरोपों की प्रकृति, उपलब्ध सामग्री, आरोपी की भूमिका, हिरासत की आवश्यकता और लागू विशेष कानून सहित कई कारकों पर निर्भर करती है।


BNSS की धारा 480 और धारा 483 कुछ परिस्थितियों में गैर-जमानती अपराधों में जमानत से संबंधित न्यायालयों की शक्तियों का प्रावधान करती हैं। प्रत्येक मामले में लागू कानूनी स्थिति का अलग से परीक्षण आवश्यक है।


6. क्या आपराधिक मामले में पुलिस के सामने बयान देना चाहिए?

पुलिस पूछताछ के दौरान व्यक्ति को सावधानीपूर्वक और कानून के अनुसार व्यवहार करना चाहिए।


भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धाराओं 180 और 181 में पुलिस द्वारा गवाहों की परीक्षा तथा पुलिस के समक्ष दिए गए बयानों के उपयोग से संबंधित प्रावधान हैं।


सामान्यतः:


झूठी जानकारी देने से बचें।

किसी अन्य व्यक्ति को झूठे मामले में फंसाने का प्रयास न करें।

बिना समझे कोई दस्तावेज स्वीकार न करें।

अपने अधिकारों और कानूनी दायित्वों के बारे में अधिवक्ता से सलाह लें।

किसी वैध जांच में बाधा न डालें।

अपने विरुद्ध अपराध स्वीकार करने के लिए दबाव डाले जाने की स्थिति में उचित कानूनी सहायता लें।

हर मामले के तथ्य अलग होते हैं। इसलिए किसी विशिष्ट पूछताछ में क्या कहना या कौन-सा कदम उठाना उचित होगा, इस बारे में व्यक्तिगत कानूनी सलाह लेना बेहतर है।


7. आपराधिक मामले में कौन-से दस्तावेज सुरक्षित रखने चाहिए?

अपने बचाव के लिए प्रासंगिक सामग्री सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण हो सकता है। उदाहरण के लिए:


FIR या शिकायत की प्रति।

पुलिस नोटिस और न्यायालय के आदेश।

संबंधित अनुबंध, रसीदें और बैंक रिकॉर्ड।

प्रासंगिक ईमेल, संदेश और कॉल से संबंधित उपलब्ध वैध रिकॉर्ड।

CCTV फुटेज या अन्य इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड।

घटनास्थल से संबंधित तस्वीरें या वीडियो।

ऐसे व्यक्तियों का विवरण जिन्हें घटना की जानकारी हो सकती है।

किसी भी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को संपादित, नष्ट या गलत तरीके से प्रस्तुत न करें। साक्ष्य की प्रामाणिकता और स्वीकार्यता का प्रश्न लागू कानून के अनुसार तय होता है।


8. NDPS और POCSO मामलों में विशेष सावधानी क्यों आवश्यक है?

NDPS Act के मामले

नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस एक्ट, 1985 के अंतर्गत मामलों में तलाशी, जब्ती, नमूना लेने की प्रक्रिया, मालखाना रिकॉर्ड, रासायनिक परीक्षण रिपोर्ट और अन्य वैधानिक प्रक्रियाएं महत्वपूर्ण हो सकती हैं।


जमानत और दोषसिद्धि से संबंधित कानूनी स्थिति आरोपित धारा, पदार्थ की प्रकृति और मात्रा तथा लागू वैधानिक प्रतिबंधों पर निर्भर करती है। विशेष रूप से वाणिज्यिक मात्रा से संबंधित मामलों में जमानत पर अतिरिक्त वैधानिक शर्तें लागू हो सकती हैं।


POCSO Act के मामले

बच्चों को लैंगिक अपराधों से संरक्षण प्रदान करने वाला POCSO अधिनियम, 2012 विशेष कानूनी प्रावधानों वाला कानून है।


ऐसे मामलों में बच्चे की पहचान, निजता और गरिमा की रक्षा करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। बच्चे की पहचान उजागर करने वाली जानकारी प्रकाशित या सोशल मीडिया पर साझा करने से बचना चाहिए। POCSO अधिनियम की धारा 23 सहित लागू प्रावधानों का पालन किया जाना चाहिए।


इन मामलों में सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप करने या किसी गवाह पर दबाव डालने के बजाय कानूनी प्रक्रिया का पालन करना उचित है।


9. क्या FIR को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है?

कुछ परिस्थितियों में FIR या आपराधिक कार्यवाही को सक्षम न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जा सकती है।


भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों के संरक्षण से संबंधित है। उचित मामले में इन शक्तियों का उपयोग न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति या न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए किया जा सकता है।


हालांकि, केवल आरोपी के निर्दोष होने के दावे से FIR स्वतः निरस्त नहीं होती। न्यायालय मामले की प्रकृति, FIR में लगाए गए आरोपों, उपलब्ध सामग्री और लागू कानूनी सिद्धांतों पर विचार करता है।


यह भी ध्यान रखना चाहिए कि FIR निरस्त कराने, आरोपमुक्त होने, जमानत प्राप्त करने और मुकदमे में दोषमुक्त होने के कानूनी आधार अलग-अलग हो सकते हैं।


10. सोशल मीडिया पर क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

आपराधिक मामले के दौरान सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट, संदेश या टिप्पणियां कभी-कभी कानूनी विवाद उत्पन्न कर सकती हैं।


इसलिए:


मामले से संबंधित अप्रमाणित आरोप प्रकाशित न करें।

गवाहों या शिकायतकर्ता को धमकी न दें।

किसी बच्चे या यौन अपराध से संबंधित पीड़ित की पहचान उजागर न करें।

निजी दस्तावेज और संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक न करें।

न्यायालय के आदेशों और लागू गोपनीयता संबंधी कानूनों का पालन करें।

Google Blogger या किसी अन्य मंच पर लेख प्रकाशित करते समय मौलिक सामग्री, सटीक जानकारी, पाठकों की निजता और लागू नीतियों का ध्यान रखना चाहिए। किसी व्यक्ति की निजी जानकारी उसकी अनुमति या वैध आधार के बिना प्रकाशित करना उचित नहीं है।


11. आपराधिक मामले में अधिवक्ता की सलाह क्यों महत्वपूर्ण है?

हर आपराधिक मामले के तथ्य, साक्ष्य, आरोपित धाराएं और कानूनी स्थिति अलग-अलग होती हैं। इसलिए केवल इंटरनेट पर उपलब्ध सामान्य जानकारी के आधार पर कानूनी निर्णय लेना उचित नहीं है।


अधिवक्ता मामले के दस्तावेजों का परीक्षण करके संभावित कानूनी उपायों, जमानत, जांच की प्रक्रिया, बचाव की रणनीति और न्यायालय में उपलब्ध विकल्पों के बारे में सलाह दे सकता है।


अधिवक्ता डी. पी. जोशी आपराधिक कानून और न्यायालयीन प्रक्रिया से संबंधित सामान्य विधिक जानकारी के माध्यम से नागरिकों को अपने अधिकारों तथा कानूनी दायित्वों के प्रति जागरूक करने का प्रयास करते हैं।


संपर्क

अधिवक्ता डी. पी. जोशी

रायपुर, छत्तीसगढ़

मोबाइल: 9893354327

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परामर्श शुल्क - एडवोकेट डी पी जोशी, एल एल एम (क्रिमिनल लॉ)

ऑनलाइन परामर्श शुल्क (कंसल्टेंसी फीस) प्रति 15 मिनट - 2000/-

कार्यालयीन परामर्श शुल्क (कंसल्टेंसी फीस) प्रति 15 मिनट - 2000/-


ऑनलाइन कंसल्टेंसी फीस ऑनलाइन अपॉइंटमेंट फिक्स होने के बाद जमा करे।

परामर्श शुल्क जमा पश्चात् वापसी नहीं होगी।

विधिक जानकारी अधिवक्ता के अपनी अनुभव एवं ज्ञान पर आधारित है।


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Legal Services - 9893354327

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Personal Secretary - 9479107138


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Advocate D P Joshi Raipur, LLM (Criminal Law)

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आयुध अधिनियम के मामले में करण तांडी दोषमुक्त -बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी

 






आयुध अधिनियम के मामले में करण तांडी दोषमुक्त


अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में रहा असफल, न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी रायपुर का फैसला


बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी


रायपुर। आयुध अधिनियम से संबंधित एक आपराधिक प्रकरण में माननीय न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, रायपुर ने आरोपी करण तांडी, पिता श्री राम तांडी को दोषमुक्त करने का निर्णय सुनाया। न्यायालय ने 26 मार्च 2025 को पारित अपने निर्णय में अभियोजन पक्ष द्वारा आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाने के आधार पर आरोपी को दोषमुक्त कर दिया। इस प्रकरण में आरोपी की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने पैरवी की।


आयुध अधिनियम के तहत दर्ज था मामला


प्राप्त जानकारी के अनुसार, थाना पंडरी, जिला रायपुर में अपराध क्रमांक 284/2024 के तहत आरोपी करण तांडी के विरुद्ध आयुध अधिनियम की धारा 25(1-ख) एवं 27(1-ख) के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया था। प्रकरण में आरोपी पर लगाए गए आरोपों के संबंध में न्यायालय में विचारण किया गया।


अभियोजन आरोप साबित करने में असफल


प्रकरण की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष को आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करना था। हालांकि, अभियोजन पक्ष आरोपों को निर्धारित कानूनी मानक के अनुरूप प्रमाणित करने में सफल नहीं रहा।


इसके बाद माननीय न्यायालय ने प्रकरण में उपलब्ध साक्ष्यों एवं परिस्थितियों पर विचार करते हुए आरोपी करण तांडी को आयुध अधिनियम की संबंधित धाराओं के आरोपों से दोषमुक्त करने का निर्णय सुनाया।


अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी


इस प्रकरण में आरोपी करण तांडी की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने न्यायालय में बचाव पक्ष की पैरवी की। न्यायालय में विचारण के उपरांत अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका, जिसके परिणामस्वरूप आरोपी को दोषमुक्त कर दिया गया।


यह निर्णय आपराधिक न्याय व्यवस्था के उस मूलभूत सिद्धांत को रेखांकित करता है, जिसके अनुसार किसी भी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन पक्ष को आरोपों को संदेह से परे साबित करना आवश्यक है।


प्रकरण का संक्षिप्त विवरण


- न्यायालय: न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, रायपुर, छत्तीसगढ़

- पीठासीन अधिकारी: कुमारी खिलेश्वरी सिन्हा

- थाना: पंडरी, जिला रायपुर

- अपराध क्रमांक: 284/2024

- आरोपी: करण तांडी, पिता श्री राम तांडी

- आरोपित धाराएं: आयुध अधिनियम की धारा 25(1-ख) एवं 27(1-ख)

- निर्णय दिनांक: 26 मार्च 2025

- बचाव पक्ष के अधिवक्ता: देव प्रसाद जोशी, 

 मोबाइल नम्बर 9893354327 

- न्यायालय का निर्णय: आरोपी दोषमुक्त

हत्या के मामले में किशन राजपूत और रोशन ध्रुव दोषमुक्त - बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी







हत्या के मामले में किशन राजपूत और रोशन ध्रुव दोषमुक्त

तृतीय अपर सत्र न्यायालय रायपुर का फैसला, अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में रहा असफल

बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी

रायपुर। हत्या के एक आपराधिक प्रकरण में माननीय तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश, रायपुर ने आरोपी किशन राजपूत एवं रोशन ध्रुव उर्फ शिवम को दोषमुक्त करने का निर्णय सुनाया। न्यायालय ने 20 अगस्त 2026 को पारित अपने निर्णय में अभियोजन पक्ष द्वारा आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाने के आधार पर दोनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। इस प्रकरण में आरोपियों की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने बचाव पक्ष की पैरवी की।

हत्या के आरोप में दर्ज था प्रकरण

प्राप्त जानकारी के अनुसार, थाना मंदिर हसौद से संबंधित इस प्रकरण में आरोपी किशन राजपूत एवं रोशन ध्रुव उर्फ शिवम के विरुद्ध हत्या का मामला दर्ज किया गया था। आरोपियों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 103(1) के साथ धारा 3(5) के अंतर्गत आरोप लगाए गए थे।

प्रकरण की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष को आरोपियों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को न्यायालय के समक्ष संदेह से परे प्रमाणित करना था। हालांकि, अभियोजन पक्ष आरोपों को निर्धारित कानूनी कसौटी पर साबित करने में सफल नहीं रहा। इसके परिणामस्वरूप न्यायालय ने दोनों आरोपियों को दोषमुक्त करने का निर्णय सुनाया।

अभियोजन आरोप साबित करने में असफल

आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी भी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन पक्ष को विश्वसनीय साक्ष्यों के आधार पर आरोपों को संदेह से परे साबित करना आवश्यक होता है। केवल आरोप लगाए जाने या आपराधिक प्रकरण दर्ज होने से किसी व्यक्ति का अपराध सिद्ध नहीं हो जाता।

इस प्रकरण में अभियोजन पक्ष आरोपियों के विरुद्ध लगाए गए हत्या के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असमर्थ रहा। न्यायालय ने प्रकरण में उपलब्ध साक्ष्यों एवं विचारण के आधार पर दोनों आरोपियों को दोषमुक्त करने का निर्णय पारित किया।

अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की बचाव पक्ष की पैरवी

इस प्रकरण में आरोपी किशन राजपूत एवं रोशन ध्रुव उर्फ शिवम की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने न्यायालय में पैरवी की। बचाव पक्ष की ओर से आरोपियों का पक्ष प्रस्तुत किया गया। विचारण के उपरांत न्यायालय ने दोनों आरोपियों को दोषमुक्त करने का निर्णय सुनाया।

यह निर्णय आपराधिक न्याय व्यवस्था के उस महत्वपूर्ण सिद्धांत को रेखांकित करता है, जिसके अनुसार अभियोजन पक्ष पर आरोपों को संदेह से परे साबित करने का दायित्व होता है। जब आरोप निर्धारित कानूनी मानक के अनुरूप साबित नहीं हो पाते, तब न्यायालय को उपलब्ध साक्ष्यों और विधिक सिद्धांतों के आधार पर निर्णय लेना होता है।

प्रकरण का विवरण

न्यायालय: तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश, रायपुर, जिला रायपुर, छत्तीसगढ़

पीठासीन अधिकारी: श्री शैलेश शर्मा

थाना: मंदिर हसौद

आरोपी: किशन राजपूत एवं रोशन ध्रुव उर्फ शिवम

आरोपित धाराएं: भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 103(1) सहपठित धारा 3(5)

निर्णय दिनांक: 20 अगस्त 2026

बचाव पक्ष के अधिवक्ता: देव प्रसाद जोशी, मोबाइल नम्बर 9893354327

न्यायालय का निर्णय: दोनों आरोपी दोषमुक्त

एससी/एसटी एक्ट सहित विभिन्न धाराओं के मामले में कुलेश्वर राम समेत तीन आरोपीगण दोषमुक्त - आरोपी कुलेश्वर राम की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी





एससी/एसटी एक्ट सहित विभिन्न धाराओं के मामले में कुलेश्वर राम समेत तीन आरोपीगण दोषमुक्त

अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल, विशेष न्यायालय ने दिया संदेह का लाभ

आरोपी कुलेश्वर राम की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी

रायपुर। रायपुर जिले में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम सहित विभिन्न कानूनों के तहत दर्ज एक आपराधिक प्रकरण में माननीय विशेष न्यायालय ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए आरोपी कुलेश्वर राम सहित तीन आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। विशेष न्यायाधीश एससी/एसटी एक्ट, रायपुर पंकज कुमार सिन्हा की अदालत ने 17 मार्च 2026 को यह निर्णय पारित किया। प्रकरण में आरोपी कुलेश्वर राम, पिता श्याम सुंदर राम की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने बचाव पक्ष की पैरवी की।


विभिन्न अधिनियमों के तहत लगाए गए थे आरोप


प्राप्त जानकारी के अनुसार, थाना धरसीवां से संबंधित प्रकरण क्रमांक 287/25 में आरोपी कुलेश्वर राम एवं अन्य तीन आरोपियों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 146(5) एवं 146, किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 79, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(ज) तथा बाल एवं किशोर श्रम प्रतिषेध एवं विनियमन अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत आरोप लगाए गए थे।


प्रकरण की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष को आरोपियों के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को न्यायालय के समक्ष संदेह से परे प्रमाणित करना था। विचारण के उपरांत न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा। इसके परिणामस्वरूप न्यायालय ने आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त करने का निर्णय सुनाया।


अभियोजन की विफलता के आधार पर मिला संदेह का लाभ


आपराधिक न्याय व्यवस्था में अभियोजन पक्ष की यह जिम्मेदारी होती है कि वह आरोपों के समर्थन में प्रस्तुत साक्ष्यों के माध्यम से आरोपी के विरुद्ध अपराध को संदेह से परे साबित करे। केवल आरोप लगाए जाने के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।


इस प्रकरण में अभियोजन पक्ष आरोपों को निर्धारित कानूनी कसौटी पर साबित करने में असफल रहा। इसी आधार पर माननीय विशेष न्यायालय ने आरोपी कुलेश्वर राम सहित अन्य तीन आरोपियों को संदेह का लाभ प्रदान करते हुए दोषमुक्त कर दिया।


बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी


प्रकरण में आरोपी कुलेश्वर राम की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने न्यायालय में पैरवी की। बचाव पक्ष ने न्यायालय के समक्ष आरोपी का पक्ष प्रस्तुत किया। विचारण के उपरांत न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों एवं प्रकरण की परिस्थितियों पर विचार करते हुए दोषमुक्ति का निर्णय पारित किया।


इस निर्णय से यह विधिक सिद्धांत पुनः स्पष्ट होता है कि आपराधिक मुकदमे में आरोपों को साबित करने का दायित्व अभियोजन पक्ष पर होता है तथा आरोपों के संदेह से परे प्रमाणित नहीं होने की स्थिति में आरोपी को विधि के अनुसार संदेह का लाभ दिया जा सकता है।


प्रकरण का संक्षिप्त विवरण


- न्यायालय: विशेष न्यायाधीश, एससी/एसटी एक्ट, रायपुर, छत्तीसगढ़

- विशेष न्यायाधीश: पंकज कुमार सिन्हा

- थाना: धरसीवां

- प्रकरण क्रमांक: 287/25

- आरोपी: कुलेश्वर राम, पिता श्याम सुंदर राम एवं अन्य तीन आरोपी

- आरोपित कानून: भारतीय न्याय संहिता, 2023; किशोर न्याय अधिनियम, 2015; एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 तथा बाल एवं किशोर श्रम प्रतिषेध एवं विनियमन अधिनियम

- निर्णय दिनांक: 17 मार्च 2026

- बचाव पक्ष के अधिवक्ता: देव प्रसाद जोशी, 9893354327

- न्यायालय का निर्णय: चारों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया गया।

पॉक्सो मामले में अनिल कुमार दोषमुक्त - आरोपी की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने पैरवी की थी

 




पॉक्सो मामले में अनिल कुमार दोषमुक्त

अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में रहा असफल, फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय का फैसला

रायपुर। रायपुर जिले में पॉक्सो अधिनियम से संबंधित एक प्रकरण में माननीय अपर सत्र न्यायाधीश द्वितीय, फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय (पॉक्सो), रायपुर ने आरोपी अनिल कुमार, पिता देव प्रसाद कोसले को दोषमुक्त कर दिया। न्यायालय के पीठासीन अधिकारी विनय कुमार प्रधान ने यह निर्णय 16 दिसंबर 2025 को सुनाया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, थाना अभनपुर में दर्ज अपराध क्रमांक 238/2022 में आरोपी अनिल कुमार के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 354 एवं 506 भाग-दो तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पॉक्सो एक्ट) की धारा 8, 11(1) एवं 12 के तहत आरोप लगाए गए थे।

अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका

प्रकरण की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष को आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करना था। न्यायालय के निर्णय के अनुसार, अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल रहा। इसके परिणामस्वरूप न्यायालय ने आरोपी अनिल कुमार को संबंधित प्रकरण में दोषमुक्त कर दिया।

बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी

इस प्रकरण में आरोपी की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने न्यायालय में पैरवी की। बचाव पक्ष की ओर से प्रकरण में आरोपी का पक्ष प्रस्तुत किया गया। न्यायालय द्वारा उपलब्ध साक्ष्यों एवं प्रकरण के तथ्यों पर विचार करने के बाद आरोपी को दोषमुक्त करने का निर्णय सुनाया गया।

यह निर्णय आपराधिक न्याय व्यवस्था में अभियोजन द्वारा आरोपों को विधि के अनुसार प्रमाणित किए जाने के महत्व को रेखांकित करता है। आपराधिक मामलों में किसी व्यक्ति के विरुद्ध आरोप लगाए जाने मात्र से उसे दोषी नहीं माना जा सकता, बल्कि अभियोजन को न्यायालय के समक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करना आवश्यक होता है।

प्रकरण का विवरण

न्यायालय: अपर सत्र न्यायाधीश द्वितीय, फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय (पॉक्सो), रायपुर, छत्तीसगढ़

पीठासीन अधिकारी: विनय कुमार प्रधान

आरोपी: अनिल कुमार, पिता देव प्रसाद कोसले

थाना: अभनपुर

अपराध क्रमांक: 238/2022

आरोपित धाराएं: भारतीय दंड संहिता की धारा 354, 506 भाग-दो तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 8, 11(1), 12

निर्णय दिनांक: 16 दिसंबर 2025

बचाव पक्ष के अधिवक्ता: देव प्रसाद जोशी

मोबाइल नम्बर - 9893354327

Saturday

पॉक्सो मामले में निर्मल कुमार वर्मा उर्फ सिद्धार्थ दोषमुक्त - आरोपी की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की थी पैरवी





पॉक्सो मामले में निर्मल कुमार वर्मा उर्फ सिद्धार्थ दोषमुक्त - आरोपी की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की थी पैरवी 

अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में रहा असफल, विशेष न्यायालय ने दिया संदेह का लाभ

रायपुर। रायपुर के विशेष पॉक्सो न्यायालय ने एक आपराधिक प्रकरण में आरोपी निर्मल कुमार वर्मा उर्फ सिद्धार्थ को दोषमुक्त कर दिया है। माननीय सिविल एवं सत्र न्यायाधीश प्रथम तथा फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय (पॉक्सो), रायपुर के पीठासीन अधिकारी श्री अच्छेलाल काछी ने 2 मार्च 2026 को प्रकरण में निर्णय पारित करते हुए आरोपी को दोषमुक्त किया। उक्त मामले में बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने पैरवी की।

तिल्दा नहीं, टिकरापारा थाना क्षेत्र का मामला प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह मामला थाना टिकरापारा, जिला रायपुर के अपराध क्रमांक 554/2025 से संबंधित है। न्यायालय में प्रकरण विशेष दांडिक प्रकरण पॉक्सो क्रमांक 161/2025 के रूप में विचाराधीन था। आरोपी निर्मल कुमार वर्मा उर्फ सिद्धार्थ के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 74 एवं 296 तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पॉक्सो एक्ट) की धारा 12 के अंतर्गत आरोप लगाए गए थे।

प्रकरण के विचारण के दौरान अभियोजन पक्ष को न्यायालय के समक्ष उपलब्ध साक्ष्यों के माध्यम से आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को विधि के अनुरूप साबित करना था। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित करने में सफल नहीं हो पाया।

संदेह से परे आरोप साबित करना अभियोजन का दायित्व

आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति को केवल आरोप लगाए जाने के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन पक्ष का दायित्व होता है कि वह विश्वसनीय एवं स्वीकार्य साक्ष्यों के आधार पर आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करे।

यदि न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्य आरोपों को निर्धारित कानूनी मानक के अनुसार प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं होते, तो आरोपी को संदेह का लाभ दिए जाने का सिद्धांत लागू हो सकता है।

इस प्रकरण में अभियोजन पक्ष अपना मामला संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। इसी आधार पर माननीय विशेष न्यायालय ने आरोपी निर्मल कुमार वर्मा उर्फ सिद्धार्थ को संबंधित आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।

बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने की पैरवी

उक्त प्रकरण में आरोपी की ओर से अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने न्यायालय में पैरवी की। मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों के संबंध में अपना पक्ष रखा।

न्यायालय द्वारा 2 मार्च 2026 को पारित निर्णय में आरोपी को दोषमुक्त किया गया। यह निर्णय आपराधिक न्याय प्रक्रिया में अभियोजन द्वारा आरोपों को प्रमाणित करने के महत्व को रेखांकित करता है।

प्रकरण का संक्षिप्त विवरण

न्यायालय: माननीय सत्र न्यायाधीश प्रथम फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय (पॉक्सो), रायपुर

पीठासीन अधिकारी: श्री अच्छेलाल काछी

विशेष दांडिक प्रकरण: पॉक्सो क्रमांक 161/2025

थाना: टिकरापारा, रायपुर

अपराध क्रमांक: 554/2025

आरोपी: निर्मल कुमार वर्मा उर्फ सिद्धार्थ

संबंधित धाराएं: भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 74 एवं 296 तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 12

निर्णय दिनांक: 2 मार्च 2026

बचाव पक्ष के अधिवक्ता: देव प्रसाद जोशी, 9893354327

निर्णय: आरोपी दोषमुक्त

पॉक्सो मामले में आरोपी टिकेश्वर डहरिया दोषमुक्त - आरोपी की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी






पॉक्सो मामले में आरोपी टिकेश्वर डहरिया दोषमुक्त - आरोपी की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी 

अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में रहा असफल, न्यायालय ने दिया संदेह का लाभ

बचाव पक्ष के अधिवक्ता: देव प्रसाद जोशी, 9893354327

रायपुर। रायपुर जिले के तिल्दा-नेवरा थाना क्षेत्र से संबंधित एक प्रकरण में माननीय अपर सत्र न्यायाधीश द्वितीय एवं फास्ट ट्रैक विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो), रायपुर की अदालत ने आरोपी टिकेश्वर ढहरिया उर्फ खिलेश्वर ढहरिया को गंभीर आपराधिक आरोपों से दोषमुक्त कर दिया है। प्रकरण में पीठासीन अधिकारी माननीय न्यायाधीश श्री विनय कुमार प्रधान द्वारा दिनांक 11 जुलाई 2025 को निर्णय पारित किया गया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह मामला थाना तिल्दा-नेवरा, जिला रायपुर के अपराध क्रमांक 320/2024 से संबंधित था। अभियोजन पक्ष द्वारा आरोपी के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो एक्ट) के अंतर्गत आरोप लगाए गए थे।

प्रकरण में आरोपी टिकेश्वर ढहरिया उर्फ खिलेश्वर ढहरिया के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 326, 363, 366, 366(2), 376(2) एवं 376(3) तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 4(2), 5(ठ) एवं 6 के तहत आरोपों का उल्लेख किया गया था।

अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया

न्यायालय में विचारण के दौरान अभियोजन पक्ष पर यह दायित्व था कि वह प्रस्तुत साक्ष्यों के माध्यम से आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को विधि के निर्धारित मानदंडों के अनुसार संदेह से परे साबित करे। आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी व्यक्ति को केवल आरोप लगाए जाने के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। दोषसिद्धि के लिए अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों का विश्वसनीय होना तथा आरोपों को प्रमाणित करना आवश्यक है।

प्रकरण के संबंध में उपलब्ध जानकारी के अनुसार, अभियोजन पक्ष आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हो पाया। इसी आधार पर न्यायालय ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।

बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी

उक्त प्रकरण में आरोपी की ओर से बचाव पक्ष के अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने पैरवी की। न्यायालयीन विचारण के दौरान बचाव पक्ष ने आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों के संबंध में अभियोजन के साक्ष्यों के मूल्यांकन के आधार पर अपना पक्ष प्रस्तुत किया।

आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि अभियोजन को आरोपी के विरुद्ध आरोपों को विधि के अनुसार प्रमाणित करना होता है। यदि प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं होते, तो आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना न्याय के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप है।

इस प्रकरण में न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के अनुसार आरोपी टिकेश्वर ढहरिया उर्फ खिलेश्वर ढहरिया को संबंधित आरोपों से दोषमुक्त किया गया।

प्रकरण का विवरण

न्यायालय: अपर सत्र न्यायाधीश द्वितीय एवं फास्ट ट्रैक विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो), रायपुर

पीठासीन अधिकारी: श्री विनय कुमार प्रधान

थाना: तिल्दा-नेवरा, जिला रायपुर

अपराध क्रमांक: 320/2024

आरोपी: टिकेश्वर ढहरिया उर्फ खिलेश्वर ढहरिया

निर्णय दिनांक: 11 जुलाई 2025

बचाव पक्ष के अधिवक्ता: देव प्रसाद जोशी, 9893354327

निर्णय: अभियोजन द्वारा आरोप संदेह से परे साबित नहीं किए जाने के कारण आरोपी दोषमुक्त

Friday

POCSO प्रकरण में रूपेंद्र कुमार धीवर उर्फ रिंकू धीवर दोषमुक्त - आरोपी की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी






POCSO प्रकरण में रूपेंद्र कुमार धीवर उर्फ रिंकू धीवर दोषमुक्त

अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में रहा असफल, अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की बचाव पक्ष की पैरवी

रायपुर। रायपुर स्थित अपर सत्र न्यायाधीश द्वितीय एवं फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय (POCSO) द्वारा पारित निर्णय में थाना खरोरा के एक आपराधिक प्रकरण में आरोपी रूपेंद्र कुमार धीवर उर्फ रिंकू धीवर को दोषमुक्त कर दिया गया। माननीय विशेष न्यायालय ने 4 जून 2026 को निर्णय पारित करते हुए आरोपी को भारतीय न्याय संहिता, 2023 तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) के अंतर्गत लगाए गए आरोपों से दोषमुक्त किया। उक्त प्रकरण में बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने पैरवी की।

थाना खरोरा में दर्ज अपराध से संबंधित था मामला

प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह मामला थाना खरोरा के अपराध क्रमांक 435/2025 से संबंधित था। प्रकरण में आरोपी रूपेंद्र कुमार धीवर उर्फ रिंकू धीवर के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 137(2), 87 एवं 64(2)(कथित उपधारा की पुष्टि आवश्यक) तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 की धारा 5 एवं 6 के अंतर्गत आरोप लगाए गए थे।

मामले की सुनवाई रायपुर स्थित अपर सत्र न्यायाधीश द्वितीय एवं फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय में हुई। विचारण के दौरान अभियोजन पक्ष को अपने आरोपों के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर मिला।

अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका

आपराधिक न्याय व्यवस्था का स्थापित सिद्धांत है कि किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन पक्ष को आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित करना आवश्यक होता है। केवल आरोप लगाए जाने के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। न्यायालय को मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों का निष्पक्ष मूल्यांकन करते हुए विधि के अनुरूप निर्णय देना होता है।

इस प्रकरण में अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा। परिणामस्वरूप, माननीय विशेष न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी रूपेंद्र कुमार धीवर उर्फ रिंकू धीवर को दोषमुक्त कर दिया।

अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने किया बचाव पक्ष का प्रतिनिधित्व

इस प्रकरण में आरोपी की ओर से अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने बचाव पक्ष की पैरवी की। मामले की न्यायिक कार्यवाही के दौरान बचाव पक्ष की ओर से आरोपी का प्रतिनिधित्व किया गया। अंततः माननीय विशेष न्यायालय ने 4 जून 2026 को निर्णय पारित करते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।

आपराधिक न्याय व्यवस्था में प्रमाण का महत्व

यह प्रकरण इस महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत की ओर ध्यान आकर्षित करता है कि आपराधिक मामलों में अभियोजन पक्ष पर आरोपों को प्रमाणित करने का दायित्व होता है। न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि तभी की जा सकती है, जब प्रस्तुत साक्ष्य विधि के निर्धारित मानकों को पूरा करते हों। यदि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल रहता है, तो न्यायालय को उपलब्ध साक्ष्यों और लागू कानून के अनुसार निर्णय करना होता है।

प्रकरण का विवरण

न्यायालय: अपर सत्र न्यायाधीश द्वितीय, फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय (POCSO), रायपुर

थाना: खरोरा, जिला रायपुर

अपराध क्रमांक: 435/2025

आरोपी: रूपेंद्र कुमार धीवर उर्फ रिंकू धीवर

निर्णय दिनांक: 4 जून 2026

परिणाम: दोषमुक्त

बचाव पक्ष के अधिवक्ता: देवप्रसाद जोशी

मोबाइल: 9893354327

POCSO एवं एससी-एसटी एक्ट के मामले में मनीष चौबे दोषमुक्त - आरोपी की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी

 





POCSO एवं एससी-एसटी एक्ट के मामले में मनीष चौबे दोषमुक्त

अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में रहा असफल, अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की बचाव पक्ष की पैरवी

रायपुर। रायपुर स्थित अपर सत्र न्यायाधीश द्वितीय, फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय में विचाराधीन एक आपराधिक प्रकरण में आरोपी मनीष चौबे, पिता पंकज चौबे, को न्यायालय ने दोषमुक्त कर दिया। माननीय न्यायालय द्वारा दिनांक 20 अगस्त 2025 को पारित निर्णय में अभियोजन पक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित नहीं कर पाने के आधार पर आरोपी को दोषमुक्त किया गया। उक्त प्रकरण में बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने पैरवी की।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, यह मामला कबीर नगर थाना क्षेत्र के अपराध क्रमांक से संबंधित था। प्रकरण में आरोपी मनीष चौबे के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 65(2), लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) की धारा 5 एवं 6 तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2) एवं 5 के अंतर्गत आरोप लगाए गए थे। इन आरोपों के संबंध में न्यायालय में विचारण की कार्यवाही की गई।

अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका

आपराधिक न्याय व्यवस्था में किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन पक्ष को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित करना आवश्यक होता है। केवल आरोप लगाए जाने से किसी व्यक्ति का अपराध सिद्ध नहीं माना जा सकता। न्यायालय द्वारा मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों और अभियोजन के पक्ष का परीक्षण किया जाता है तथा उसके बाद विधि के अनुरूप निर्णय पारित किया जाता है।

इस प्रकरण में भी अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित करने में सफल नहीं रहा। परिणामस्वरूप, माननीय विशेष न्यायालय ने आरोपी मनीष चौबे को दोषमुक्त कर दिया।

बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी

उक्त प्रकरण में आरोपी मनीष चौबे की ओर से अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने न्यायालय में बचाव पक्ष का प्रतिनिधित्व किया। प्रकरण की सुनवाई के दौरान अभियोजन के आरोपों के विरुद्ध बचाव पक्ष की ओर से पैरवी की गई। अंततः माननीय न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निर्णय पारित करते हुए आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।

यह निर्णय इस महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को रेखांकित करता है कि आपराधिक मुकदमे में अभियोजन पक्ष पर आरोपों को प्रमाणित करने का दायित्व होता है और दोषसिद्धि संदेह से परे प्रमाण के आधार पर ही की जा सकती है।

निर्णय दिनांक: 20 अगस्त 2025

बचाव पक्ष/आरोपी के अधिवक्ता: देव प्रसाद जोशी मोबाइल: 9893354327



पॉक्सो प्रकरण में सूरज मिश्रा दोषमुक्त - आरोपी की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी

 


पॉक्सो प्रकरण में सूरज मिश्रा दोषमुक्त - आरोपी की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी 

चतुर्थ फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय का फैसला; अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा

रायपुर। राजधानी रायपुर के कबीर नगर थाना क्षेत्र से संबंधित एक पॉक्सो प्रकरण में माननीय चतुर्थ फास्ट ट्रैक विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो), रायपुर ने आरोपी सूरज मिश्रा को दोषमुक्त कर दिया है। प्रकरण में पीठासीन अधिकारी श्री गिरीश कुमार मंडावी ने दिनांक 22 मई 2026 को निर्णय पारित किया। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने पैरवी की।
क्या था मामला?
न्यायालयीन अभिलेखों के अनुसार, थाना कबीर नगर, रायपुर में अपराध क्रमांक 11/2025 के अंतर्गत आरोपी सूरज मिश्रा के विरुद्ध मामला दर्ज किया गया था। अभियोजन के अनुसार, प्रकरण वर्ष 2024 की कथित घटना से संबंधित था। मामले में भारतीय न्याय संहिता तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पॉक्सो एक्ट) की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत आरोप लगाए गए थे।
पुलिस विवेचना के पश्चात प्रकरण न्यायालय में प्रस्तुत किया गया, जहां अभियोजन एवं बचाव पक्ष को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला।
न्यायालय में हुआ साक्ष्यों का परीक्षण
प्रकरण की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने आरोपों के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत किए। वहीं, बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने अभियोजन के मामले का परीक्षण करते हुए आरोपी का पक्ष न्यायालय के समक्ष रखा।
आपराधिक न्याय व्यवस्था में अभियोजन का दायित्व होता है कि वह आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को विश्वसनीय एवं स्वीकार्य साक्ष्यों के आधार पर संदेह से परे प्रमाणित करे। केवल आरोप लगाए जाने अथवा प्राथमिकी दर्ज होने से किसी व्यक्ति का अपराध सिद्ध नहीं माना जा सकता।
अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल
न्यायालय ने प्रकरण में प्रस्तुत साक्ष्यों एवं अभिलेखों का परीक्षण करने के बाद दिनांक 22 मई 2026 को अपना निर्णय सुनाया और आरोपी सूरज मिश्रा को दोषमुक्त कर दिया।
यह निर्णय आपराधिक न्याय व्यवस्था के उस स्थापित सिद्धांत को रेखांकित करता है, जिसके अनुसार किसी भी अभियुक्त को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन को आरोपों को विधि के अनुरूप संदेह से परे प्रमाणित करना आवश्यक है।
बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी
इस प्रकरण में आरोपी सूरज मिश्रा की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने पैरवी की। प्रकरण में न्यायालय द्वारा पारित निर्णय के पश्चात आरोपी को दोषमुक्त किया गया।
पॉक्सो जैसे संवेदनशील मामलों में पीड़ित की पहचान एवं निजता की रक्षा के साथ-साथ निष्पक्ष सुनवाई और अभियुक्त के विधिक अधिकारों का संरक्षण भी न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बचाव पक्ष के अधिवक्ता:
अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी
जिला एवं सत्र न्यायालय रायपुर 
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
📱 मोबाइल नंबर: 9893354327

Thursday

NDPS प्रकरण में आरोपी मोहम्मद गुफरान दोषमुक्त, -अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी








NDPS प्रकरण में आरोपी मोहम्मद गुफरान दोषमुक्त, अभियोजन आरोप संदेह से परे सिद्ध करने में रहा विफल

विशेष दांडिक प्रकरण क्रमांक 252/2024 में विशेष न्यायालय का फैसला; धारा 21(C) NDPS Act के आरोप से मिली राहत, अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी (मो 9893354327)

रायपुर। विशेष न्यायालय, रायपुर ने एनडीपीएस अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रकरण में आरोपी मोहम्मद गुफरान, पिता मोहम्मद इसहाक खान को दोषमुक्त कर दिया है। विशेष दांडिक प्रकरण क्रमांक 252/2024, अपराध क्रमांक 520/2024, थाना आरंग, जिला रायपुर में माननीय विशेष न्यायाधीश श्रीमती किरण थवाईत के न्यायालय द्वारा 23 सितंबर 2025 को निर्णय पारित किया गया। आरोपी की ओर से अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने पैरवी की।

कोडीनयुक्त सिरप रखने का था आरोप

अभियोजन की ओर से आरोपी के विरुद्ध स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम (NDPS Act) की धारा 21(C) के तहत आरोप लगाया गया था। अभियोजन का आरोप था कि दिनांक 18 अगस्त 2024 को ग्राम रसनी टोल प्लाजा रेस्टोरेंट के पास, थाना आरंग क्षेत्र में आरोपी के कब्जे से प्रतिबंधित/कोडीनयुक्त कफ सिरप बरामद किया गया।

अभियोजन के अनुसार आरोपी के कब्जे से 34 सीसी अंग्रेजी दवा कोडीन फॉस्फेट एवं ट्राइप्लोडीन हाइड्रोक्लोराइड सिरप ‘कोडिविक्स-टी’, प्रत्येक 100 एमएल तथा 25 सीसी ट्राइप्लोडीन हाइड्रोक्लोराइड एवं कोडीन फॉस्फेट सिरप ‘जूसफिया’, प्रत्येक 100 एमएल बरामद होना बताया गया था। इस प्रकार कुल 59 सीसी अर्थात लगभग 5.9 लीटर सिरप की बरामदगी का दावा अभियोजन द्वारा किया गया।

बचाव पक्ष ने अभियोजन साक्ष्य पर उठाए सवाल

प्रकरण की सुनवाई के दौरान अभियोजन द्वारा आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को साक्ष्यों के माध्यम से प्रमाणित करने का प्रयास किया गया। वहीं, आरोपी की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने अभियोजन के साक्ष्यों एवं मामले की परिस्थितियों का परीक्षण करते हुए न्यायालय के समक्ष बचाव पक्ष की ओर से प्रभावी तर्क प्रस्तुत किए।

बचाव पक्ष की ओर से यह मूल प्रश्न न्यायालय के समक्ष रखा गया कि क्या अभियोजन द्वारा प्रस्तुत मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्य के आधार पर आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को संदेह से परे प्रमाणित माना जा सकता है। आपराधिक न्याय व्यवस्था के मूल सिद्धांत के अनुसार अभियोजन पर आरोप को विधि के निर्धारित मानक पर सिद्ध करने का दायित्व होता है और संदेह का लाभ आरोपी को प्राप्त होता है।

अभियोजन आरोप सिद्ध करने में असफल

मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों एवं संपूर्ण परिस्थितियों के परीक्षण के पश्चात न्यायालय ने अभियोजन के मामले का मूल्यांकन किया। न्यायालय के समक्ष अभियोजन आरोपी के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को आवश्यक कानूनी कसौटी पर संदेह से परे सिद्ध करने में सफल नहीं हो सका।

इसी आधार पर माननीय विशेष न्यायाधीश श्रीमती किरण थवाईत, रायपुर द्वारा दिनांक 23 सितंबर 2025 को आरोपी मोहम्मद गुफरान को NDPS Act की धारा 21(C) के आरोप से दोषमुक्त किए जाने का निर्णय पारित किया गया।

बचाव पक्ष की प्रभावी पैरवी

प्रकरण में आरोपी मोहम्मद गुफरान की ओर से अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने पैरवी की। बचाव पक्ष की ओर से अभियोजन द्वारा प्रस्तुत मामले की कमियों एवं साक्ष्यों की विश्वसनीयता से संबंधित पहलुओं को न्यायालय के समक्ष रखा गया। सुनवाई के उपरांत न्यायालय द्वारा आरोपी को दोषमुक्त किए जाने से उसे इस प्रकरण में बड़ी राहत मिली।

अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी

मोबाइल : 9893354327

POCSO मामले में अभियुक्त राजेश साहू दोषमुक्त - आरोपी की ओर से अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी

 






POCSO मामले में अभियुक्त राजेश साहू दोषमुक्त, अभियोजन आरोप सिद्ध करने में रहा विफल

माननीय विशेष न्यायालय पाक्सो का महत्वपूर्ण फैसला — करीब दो वर्ष से अधिक समय तक अभिरक्षा में रहा अभियुक्त; अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी ने की पैरवी 

फैसला दिनांक - 07 मई 2025

रायपुर। अपर सत्र न्यायाधीश एवं द्वितीय फास्ट ट्रैक विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो), रायपुर के न्यायालय ने विशेष आपराधिक प्रकरण क्रमांक 99/2023, अपराध क्रमांक 129/2023, थाना खम्हारडीह, जिला रायपुर में अभियुक्त राजेश साहू, पिता राजकुमार साहू, उम्र 20 वर्ष को अभियोजन द्वारा लगाए गए आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। न्यायालय ने यह निर्णय 07 मई 2025 को सुनाया। प्रकरण में अभियुक्त की ओर से अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने पैरवी की।

अभियोजन के अनुसार अभियुक्त के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की धारा 363, 366, 376(3), 376(2)(ढ) तथा लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 4(2), 5(घ) एवं 6 के अंतर्गत आरोप लगाए गए थे। मामले में अभियोजन द्वारा विभिन्न दस्तावेजों, चिकित्सकीय साक्ष्यों तथा अन्य साक्ष्यों के माध्यम से आरोपों को सिद्ध करने का प्रयास किया गया।

न्यायालयीन अभिलेख के अनुसार अभियुक्त को 18 अप्रैल 2023 को गिरफ्तार किया गया था और निर्णय दिनांक 07 मई 2025 तक वह अभिरक्षा में रहा। इस प्रकार अभियुक्त ने लगभग दो वर्ष 19 दिन अर्थात कुल 750 दिन अभिरक्षा में बिताए।

अभियोजन आरोप सिद्ध करने में असफल

प्रकरण की सुनवाई के दौरान अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों एवं समस्त परिस्थितियों का न्यायालय ने परीक्षण किया। बचाव पक्ष की ओर से अभियुक्त के अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने अभियोजन के साक्ष्यों पर सवाल उठाते हुए न्यायालय के समक्ष यह पक्ष रखा कि आपराधिक मामले में अभियोजन को आरोपों को विधि के निर्धारित मानदंड के अनुसार सिद्ध करना आवश्यक है तथा केवल आरोप लगाए जाने मात्र से अभियुक्त को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

बचाव पक्ष द्वारा प्रकरण के तथ्यों, साक्ष्यों एवं अभियोजन की कमियों को न्यायालय के समक्ष प्रभावी ढंग से रखा गया। सुनवाई के उपरांत न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अभियोजन आरोपों को आवश्यक कानूनी कसौटी पर सिद्ध करने में सफल नहीं रहा। इसके बाद माननीय पीठासीन अधिकारी श्री विनय कुमार प्रधान द्वारा अभियुक्त राजेश साहू को संबंधित आरोपों से दोषमुक्त किए जाने का निर्णय पारित किया गया।

अभियुक्त की ओर से अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने की पैरवी

प्रकरण में अभियुक्त राजेश साहू की ओर से अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी ने पैरवी की। अधिवक्ता जोशी ने बचाव पक्ष की ओर से अभियोजन साक्ष्य का परीक्षण करते हुए न्यायालय के समक्ष विधिक एवं तथ्यात्मक आधार प्रस्तुत किए।

अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी

मोबाइल : 9893354327

Wednesday

गुरु घासीदास बाबा के संदेश आज भी समाज को सत्य, समानता, अहिंसा और मानवता की राह दिखाते हैं - अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी

 


*गुलाम भारत में सत्य की राह पर एक नई सामाजिक चेतना : सतनाम पंथ की स्थापना*

*गुरु घासीदास बाबा के संदेश आज भी समाज को सत्य, समानता, अहिंसा और मानवता की राह दिखाते हैं - अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी*

जब भारत गुलामी के दौर से गुजर रहा था, उस समय देश की सामाजिक परिस्थितियां भी अनेक चुनौतियों से घिरी हुई थीं। समाज में ऊंच-नीच, भेदभाव, रूढ़ियां, अंधविश्वास और अनेक सामाजिक कुरीतियों का प्रभाव था। ऐसे समय में छत्तीसगढ़ की धरती पर संत गुरु घासीदास बाबा ने सत्य को जीवन का आधार बनाकर सामाजिक जागरण का संदेश दिया। उनके विचारों से प्रेरित सतनाम पंथ केवल आध्यात्मिक चेतना का माध्यम नहीं रहा, बल्कि सामाजिक समानता, आत्मसम्मान और मानवीय गरिमा की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल बना।

गुरु घासीदास बाबा ने लोगों को यह संदेश दिया कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके जन्म, जाति अथवा सामाजिक स्थिति से नहीं, बल्कि उसके कर्म, चरित्र और आचरण से होनी चाहिए। उन्होंने सत्य को सर्वोच्च जीवन-मूल्य के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया।

सतनाम—सत्य को जीवन का आधार बनाने का संदेश

गुरु घासीदास बाबा के संदेश का केंद्रीय भाव ‘सतनाम’ है। सतनाम को केवल एक नाम या धार्मिक संबोधन के रूप में देखने के बजाय सत्य की अनुभूति और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा के रूप में समझा जा सकता है।

उनका संदेश था कि व्यक्ति अपने जीवन में सत्य को अपनाए। सत्य केवल बोलने तक सीमित न रहे, बल्कि उसके विचार, व्यवहार और कर्म में भी दिखाई दे। जब व्यक्ति के जीवन में सत्य आता है तो उसके व्यवहार में ईमानदारी, जिम्मेदारी और नैतिकता स्वतः विकसित होती है।

मनखे-मनखे एक समान

गुरु घासीदास बाबा के विचारों में मानव समानता का विशेष महत्व दिखाई देता है। उनका संदेश था कि सभी मनुष्य मूल रूप से समान हैं और किसी के साथ जन्म अथवा सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।

आज के लोकतांत्रिक भारत में समानता संविधान का महत्वपूर्ण सिद्धांत है, लेकिन सामाजिक समानता की आवश्यकता आज भी बनी हुई है। गुरु घासीदास बाबा का यह संदेश हमें याद दिलाता है कि कानून के साथ-साथ समाज की सोच में भी समानता आनी चाहिए।

अहिंसा और करुणा का मार्ग

गुरु घासीदास बाबा ने हिंसा और वैमनस्य के स्थान पर शांति, करुणा और अहिंसा को महत्व दिया। समाज में विवाद होना स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन उसका समाधान हिंसा के माध्यम से करना मानवता के हित में नहीं है।

आज जब छोटी-छोटी बातों पर विवाद और आक्रोश बढ़ता दिखाई देता है, तब अहिंसा और संयम का यह संदेश विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है।

नशे से दूर रहने की प्रेरणा

गुरु घासीदास बाबा के सामाजिक संदेशों में नशामुक्त जीवन का भी महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। नशा व्यक्ति के स्वास्थ्य और परिवार को प्रभावित करने के साथ-साथ आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं को भी जन्म दे सकता है।

इसलिए उनके विचारों को आज नशामुक्त समाज के निर्माण से जोड़कर देखा जा सकता है। विशेष रूप से युवाओं को नशे से दूर रखना परिवार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है।

अंधविश्वास और आडंबर से ऊपर उठने का संदेश

गुरु घासीदास बाबा ने लोगों को सत्य और विवेक की ओर प्रेरित किया। उनके संदेशों का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि मनुष्य को केवल परंपरा या भय के कारण किसी बात को स्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने जीवन में विवेक, सत्य और नैतिकता को महत्व देना चाहिए।

आस्था व्यक्ति के जीवन का निजी और महत्वपूर्ण पक्ष हो सकती है, लेकिन आस्था के नाम पर शोषण, भेदभाव या अंधानुकरण को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए। आज के वैज्ञानिक युग में यह संदेश और अधिक उपयोगी हो जाता है।

सदाचार और स्वच्छ जीवन

गुरु घासीदास बाबा ने व्यक्ति के आचरण और चरित्र को महत्व दिया। सत्य बोलना, ईमानदारी से जीवन जीना, दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना और गलत कार्यों से दूर रहना किसी भी स्वस्थ समाज की आधारशिला है।

यदि व्यक्ति अपने आचरण में सुधार करता है तो परिवार सुधरता है, परिवार से समाज सुधरता है और समाज से राष्ट्र मजबूत होता है। इसलिए सामाजिक परिवर्तन का पहला कदम व्यक्ति के अपने जीवन से शुरू होना चाहिए।

जीवों के प्रति दया और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता

गुरु घासीदास बाबा के संदेशों में जीवों के प्रति दया और संवेदनशीलता का भाव भी महत्वपूर्ण है। मनुष्य को अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर प्रकृति और अन्य जीवों के प्रति भी जिम्मेदार होना चाहिए।

आज पर्यावरण संकट, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन की परिस्थितियों में यह दृष्टिकोण नई पीढ़ी को संतुलित जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा दे सकता है।

दिखावे से अधिक महत्वपूर्ण है आचरण

गुरु घासीदास बाबा की विचारधारा का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि केवल बाहरी दिखावा व्यक्ति को श्रेष्ठ नहीं बनाता। वास्तविक श्रेष्ठता उसके व्यवहार और चरित्र से निर्धारित होती है।

आज सोशल मीडिया और प्रदर्शन की संस्कृति के दौर में यह विचार विशेष रूप से प्रासंगिक है। व्यक्ति दूसरों को प्रभावित करने के बजाय अपने वास्तविक जीवन में ईमानदारी और मानवता को स्थान दे, यही सच्ची सामाजिक चेतना है।

आज गुरु घासीदास बाबा को याद करने का अर्थ

गुरु घासीदास बाबा को केवल जयंती या किसी विशेष अवसर पर याद करना उनके संदेश की पूर्णता नहीं है। उनके प्रति वास्तविक सम्मान तब होगा, जब हम उनके विचारों को अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करें।

यदि हम सत्य बोलें, भेदभाव न करें, नशे से दूर रहें, हिंसा से बचें, अंधविश्वास और शोषण का विरोध करें, प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान करें तथा जरूरतमंद के प्रति संवेदनशील रहें, तो यही उनके संदेशों को आगे बढ़ाने का वास्तविक माध्यम होगा।

गुलाम भारत के सामाजिक वातावरण में सत्य और समानता का संदेश देना एक साहसिक सामाजिक पहल थी। गुरु घासीदास बाबा ने लोगों में आत्मसम्मान और सामाजिक चेतना जगाने का प्रयास किया। उनका संदेश किसी एक समय या पीढ़ी तक सीमित नहीं है।

आज भी उनके विचार हमें यह सिखाते हैं कि समाज में वास्तविक परिवर्तन केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि मनुष्य की सोच और आचरण बदलने से आता है।

सतनाम का संदेश इसलिए आज भी प्रासंगिक है—क्योंकि सत्य, समानता, अहिंसा, सदाचार और मानवता किसी एक काल, जाति या समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज के लिए आवश्यक मूल्य हैं।

गुरु घासीदास बाबा को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके संदेश को केवल सुनें नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।

— *अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी, 9893354327*



Tuesday

माता-पिता के प्रति शादीशुदा बच्चों के कर्तव्य

 


*माता-पिता के प्रति शादीशुदा बच्चों के कर्तव्य*

*कभी ठहरकर खुद से पूछिए—जब आप दुख और तकलीफ में थे, तब आपके माता-पिता ने क्या किया था और आज आप उनके लिए क्या कर रहे हैं?*

*अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी* 9893354327 

विवाह के बाद जीवन की परिस्थितियां बदलती हैं। नई जिम्मेदारियां आती हैं, पति-पत्नी का अपना संसार बसता है, बच्चों की परवरिश, शिक्षा, नौकरी और भविष्य की चिंता जीवन का हिस्सा बन जाती है। यह सब स्वाभाविक है। लेकिन इन नई जिम्मेदारियों के बीच क्या हम उन माता-पिता को भूल रहे हैं, जिन्होंने हमारे जीवन की नींव रखी?

यह सवाल केवल दूसरों से पूछने का नहीं, बल्कि स्वयं से पूछने का है।

जरा एक पल रुककर सोचिए—जब आप छोटे थे, बीमार होते थे, किसी परेशानी में होते थे या जीवन में असफलता का सामना करते थे, तब आपके माता-पिता आपके लिए क्या करते थे?

क्या उन्होंने आपकी परेशानी देखकर रातों की नींद नहीं गंवाई थी? क्या आपकी बीमारी में आपके पास बैठकर चिंता नहीं की थी? क्या आपकी पढ़ाई, नौकरी और भविष्य के लिए अपनी अनेक इच्छाओं का त्याग नहीं किया था? जब आपको किसी सहारे की जरूरत थी, तब क्या उन्होंने यह पूछा था कि "हमारे पास समय है या नहीं"?

अधिकांश माता-पिता ने अपनी संतान की जरूरत को अपनी जरूरत से पहले रखा। बच्चों की खुशी को अपनी खुशी माना और उनकी परेशानी को अपनी परेशानी समझा।

आज जब वही माता-पिता उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच गए हैं, जहां उन्हें संतान के समय, सहयोग, सम्मान और अपनत्व की आवश्यकता है, तब हमें स्वयं से एक और सवाल पूछना चाहिए—

आज हम उनके साथ क्या कर रहे हैं?

क्या हम उनके लिए समय निकालते हैं? क्या हम उनकी बातें धैर्य से सुनते हैं? क्या उनकी बीमारी और दवाइयों की जानकारी रखते हैं? क्या उनकी आर्थिक और दैनिक जरूरतों को समझते हैं? क्या हम नियमित रूप से उनका हालचाल पूछते हैं? या फिर हमारी व्यस्त जिंदगी में माता-पिता के लिए केवल औपचारिक फोन कॉल और त्योहारों की शुभकामनाएं ही बची हैं?

क्या हमारा व्यवहार माता-पिता के साथ अच्छा है?

यह सवाल कठोर लग सकता है, लेकिन हर शादीशुदा बेटे-बेटी को कभी न कभी अपने मन में इसका उत्तर जरूर तलाशना चाहिए।

विवाह के बाद जीवनसाथी और बच्चों के प्रति जिम्मेदारियां बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन नई जिम्मेदारियां मिलने का अर्थ पुरानी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेना नहीं है। माता-पिता को समय देना, उनका सम्मान करना और आवश्यकता पड़ने पर उनका सहयोग करना पारिवारिक संस्कार का हिस्सा है।

कई बार माता-पिता को बड़ी आर्थिक सहायता से अधिक अपने बच्चों का थोड़ा सा समय चाहिए होता है। वे चाहते हैं कि उनका बेटा या बेटी कुछ देर उनके पास बैठे, उनकी बात सुने, उनकी बीमारी के बारे में पूछे और उन्हें यह एहसास कराए कि वे आज भी परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

माता-पिता हमेशा पैसे नहीं मांगते, कभी-कभी अपनापन मांगते हैं

बुढ़ापे में व्यक्ति की जरूरतें बदल जाती हैं। शरीर कमजोर हो सकता है, सामाजिक दायरा छोटा हो सकता है और अकेलापन बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में संतान का एक फोन, एक मुलाकात, डॉक्टर के पास साथ जाना या कुछ समय साथ बैठना भी माता-पिता के लिए बहुत मायने रखता है।

इसलिए माता-पिता के प्रति कर्तव्य का अर्थ केवल उन्हें पैसे देना नहीं है। सम्मान, समय, सुरक्षा, चिकित्सा सहायता, भावनात्मक सहयोग और निर्णयों में उनकी गरिमा बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

जीवनसाथी और माता-पिता के बीच संतुलन जरूरी

विवाह के बाद सबसे बड़ी चुनौती कई बार माता-पिता और जीवनसाथी के बीच संतुलन बनाने की होती है। लेकिन इसका समाधान किसी एक रिश्ते की उपेक्षा करना नहीं है।

पति-पत्नी को एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हुए माता-पिता के प्रति सम्मान बनाए रखना चाहिए। वहीं माता-पिता को भी अपने विवाहित बच्चों के वैवाहिक जीवन की स्वतंत्रता और परिस्थितियों का सम्मान करना चाहिए।

परिवार तब मजबूत होता है जब रिश्तों में अधिकार से अधिक संवाद और अपेक्षाओं से अधिक समझ होती है।

बेटा ही नहीं, बेटी भी माता-पिता की संतान है

बदलते समाज में यह सोच भी बदल रही है कि माता-पिता की जिम्मेदारी केवल बेटे की होती है। बेटी भी माता-पिता की संतान है और अपनी परिस्थितियों एवं सामर्थ्य के अनुसार उनके प्रति प्रेम, सम्मान और सहयोग का दायित्व निभा सकती है।

माता-पिता के लिए सबसे बड़ी खुशी अक्सर यह होती है कि उनकी संतान चाहे जहां रहे, लेकिन उन्हें भूले नहीं।

आज अपने बच्चों के बारे में भी सोचिए

इस विषय का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न शायद यही है—

आप अपने बच्चों से भविष्य में क्या उम्मीद रखते हैं?

क्या आप चाहते हैं कि आपके बच्चे बड़े होकर आपकी चिंता करें? बीमारी में आपके साथ रहें? आपकी बात सुनें? आपको सम्मान दें? अकेलेपन में आपका साथ दें? आपकी जरूरत के समय आपके पास खड़े हों?

यदि इन सवालों का उत्तर "हां" है, तो एक और सवाल स्वयं से पूछना होगा—

क्या आज आप अपने माता-पिता के साथ वैसा ही व्यवहार कर रहे हैं, जैसा व्यवहार आप कल अपने बच्चों से चाहते हैं?

बच्चे केवल हमारी बातें सुनकर संस्कार नहीं सीखते, वे हमारे व्यवहार को देखकर सीखते हैं। यदि वे आज देखते हैं कि हम अपने वृद्ध माता-पिता का सम्मान करते हैं, उनकी सहायता करते हैं और उनके लिए समय निकालते हैं, तो उनके मन में भी परिवार और बुजुर्गों के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है।

कल जब हम स्वयं वृद्ध होंगे, तो हमारे बच्चे हमारे साथ कैसा व्यवहार करेंगे, इसकी नींव कहीं न कहीं आज हमारे व्यवहार में ही रखी जा रही है।

माता-पिता बोझ नहीं, हमारी जीवन-यात्रा की जड़ हैं

आधुनिक जीवन में संयुक्त परिवारों का स्वरूप बदल रहा है। बच्चे पढ़ाई और रोजगार के लिए दूसरे शहरों या देशों में चले जाते हैं। अलग रहना हमेशा गलत नहीं है। परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। लेकिन दूरी को उपेक्षा का कारण बनाना उचित नहीं है।

यदि साथ रहना संभव नहीं है तो नियमित फोन किया जा सकता है, वीडियो कॉल की जा सकती है, उनकी चिकित्सा और आर्थिक आवश्यकताओं की व्यवस्था की जा सकती है और समय-समय पर उनसे मिलने का प्रयास किया जा सकता है।

माता-पिता की सेवा का अर्थ हमेशा उनके साथ एक ही घर में रहना नहीं है। उनकी जरूरत के समय उनके साथ खड़ा होना ही वास्तविक बात है।

एक बार अपने अतीत और भविष्य दोनों को देखिए

कभी अपने बचपन को याद कीजिए। जब आप चलना नहीं जानते थे, उन्होंने आपका हाथ पकड़ा। जब आप बोलना नहीं जानते थे, उन्होंने आपकी बात समझी। जब आप गिरते थे, उन्होंने उठाया। जब आप असफल हुए, उन्होंने हौसला दिया। जब दुनिया ने आपको नकारा, तब भी माता-पिता ने आपको स्वीकार किया।

आज यदि उनके कदम लड़खड़ा रहे हैं, तो क्या हमारा हाथ उनके लिए आगे नहीं बढ़ना चाहिए?

आज यदि उन्हें किसी की बात सुनने की जरूरत है, तो क्या हमारे पास उनके लिए कुछ समय नहीं होना चाहिए?

आज यदि वे हमारी ओर उम्मीद से देखते हैं, तो क्या हमें यह याद नहीं करना चाहिए कि कभी हम भी उनकी ओर उम्मीद से देखते थे?

अंत में खुद से कुछ सवाल

हर शादीशुदा व्यक्ति को समय-समय पर अपने आप से कुछ सवाल जरूर पूछने चाहिए—

जब मैं दुख और तकलीफ में था, तब मेरे माता-पिता ने मेरे लिए क्या किया था?

आज मैं उनके दुख और तकलीफ में उनके लिए क्या कर रहा हूं?

क्या मेरा वर्तमान व्यवहार उनके साथ वास्तव में वैसा ही है, जैसा एक संतान को उनके साथ करना चाहिए?

क्या मेरी व्यस्तता इतनी बड़ी है कि मेरे माता-पिता के लिए मेरे पास समय ही नहीं है?

यदि कल मेरे बच्चे मेरे साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा मैं आज अपने माता-पिता के साथ कर रहा हूं, तो क्या मुझे वह व्यवहार स्वीकार होगा?

इन प्रश्नों का उत्तर किसी और को नहीं देना है। उत्तर हमें स्वयं अपने अंतर्मन को देना है।

माता-पिता के प्रति सम्मान केवल एक सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि हमारी मानवीय जिम्मेदारी है। विवाह के बाद परिवार बढ़ता है, रिश्ते कम नहीं होते। जीवनसाथी और बच्चों के प्रति जिम्मेदारी निभाते हुए माता-पिता के प्रति कर्तव्य को भी जीवित रखना ही संतुलित और संवेदनशील पारिवारिक जीवन की पहचान है।

आज माता-पिता के लिए जो समय हमारे पास है, वही सबसे मूल्यवान है। क्योंकि समय बीत जाने के बाद पछतावा तो रह सकता है, लेकिन बीता हुआ समय वापस नहीं आता।

और शायद सबसे बड़ा सवाल यही है—

जिस प्यार, सुरक्षा और सम्मान की उम्मीद हम अपने बच्चों से अपने बुढ़ापे में करते हैं, क्या वही प्यार, सुरक्षा और सम्मान हम आज अपने माता-पिता को दे रहे हैं?

अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी 

जिला एवं सत्र न्यायालय रायपुर छत्तीसगढ़ 

9893354327