D.P. JOSHI (ADVOCATE)
Advocate Dev Prasad (D.P.) Joshi is a criminal lawyer practicing at the ''District & Sessions Court, Raipur, and Chhattisgarh High Court, Bilaspur''. This website provides citizens with legal information, preliminary guidance and consultation services relating to criminal law, bail, anticipatory bail and court matters. Visitors can share their legal concerns and request an appointment for professional legal consultation. Call/WhatsApp: "9893354327".
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सूचना का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब झूठी और भ्रामक सूचना पर होगी जवाबदेही : अधिवक्ता डी.पी. जोशी #एक नज़र में • लोक सूचना अधिकारी (PIO) द्व...
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*हत्या के मामले में दो आरोपी दोषमुक्त, न्यायालय तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश शैलेश शर्मा ने सुनाया फैसला* रायपुर, 20 अगस्त 2026। वर्ष 2024 में ...
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*POCSO के बढ़ते मामलों को रोकने की पहली जरूरत—अपराध के बाद नहीं, अपराध से पहले जागरूकता* - *अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी* *बच्चों की सुरक्षा के...
Tuesday, September 8, 2026
पुलिसकर्मियों के मानवाधिकार : वर्दी के भीतर के इंसान की गरिमा, श्रम और सेवा-अधिकार — Advocate D.P. Joshi
सूचना का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब झूठी और भ्रामक सूचना पर होगी जवाबदेही : अधिवक्ता डी.पी. जोशी
सूचना का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब झूठी और भ्रामक सूचना पर होगी जवाबदेही : अधिवक्ता डी.पी. जोशी
#एक नज़र में
• लोक सूचना अधिकारी (PIO) द्वारा जानबूझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक सूचना देना सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की भावना के विपरीत है।
• सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20(1) के अंतर्गत दोषी लोक सूचना अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन की दर से अधिकतम ₹25,000 तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।
• धारा 20(2) के तहत सूचना आयोग संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा कर सकता है।
• प्रत्येक गलत सूचना दंडनीय नहीं होती। दंड तभी लगाया जाता है जब यह सिद्ध हो कि सूचना जानबूझकर, दुर्भावनापूर्ण अथवा अभिलेखों के विपरीत दी गई है।
• रिकॉर्ड छिपाना, सूचना नष्ट करना या जानबूझकर गुमराह करना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नागरिकों के वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
• पारदर्शी शासन की सबसे बड़ी पहचान सही सूचना है, जबकि भ्रामक सूचना लोकतंत्र और विधि के शासन पर जनता के विश्वास को कमजोर करती है।
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारतीय लोकतंत्र की उन ऐतिहासिक उपलब्धियों में से एक है जिसने शासन को जनता के प्रति अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और जवाबदेह बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। यह अधिनियम केवल सूचना प्राप्त करने का कानून नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की आत्मा है। नागरिकों को सरकारी निर्णयों, सार्वजनिक धन के उपयोग, प्रशासनिक कार्यवाही तथा सार्वजनिक प्राधिकरणों के अभिलेखों तक वैधानिक पहुँच प्रदान करना इसका मूल उद्देश्य है। लोकतंत्र तभी सशक्त होता है जब सरकार के कार्य जनता की निगरानी के दायरे में हों और जनता को सही एवं प्रमाणिक जानकारी समय पर प्राप्त हो।
इस पूरी व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी लोक सूचना अधिकारी (Public Information Officer – PIO) होता है। उसकी जिम्मेदारी केवल सूचना भेज देना नहीं, बल्कि उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर सही, पूर्ण, प्रमाणिक और समयबद्ध सूचना उपलब्ध कराना है। यदि कोई अधिकारी जानबूझकर गलत, अपूर्ण अथवा भ्रामक सूचना देता है, रिकॉर्ड के विपरीत उत्तर देता है, सूचना छिपाता है या सूचना उपलब्ध कराने में बाधा उत्पन्न करता है, तो वह केवल एक नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि सूचना के अधिकार अधिनियम की मूल भावना और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को भी आघात पहुँचाता है।
इसी उद्देश्य से अधिनियम की धारा 20 में दंडात्मक व्यवस्था की गई है। यदि केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग यह पाता है कि लोक सूचना अधिकारी ने बिना उचित कारण सूचना देने से इनकार किया, निर्धारित समय सीमा में सूचना उपलब्ध नहीं कराई, जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना दी, सूचना नष्ट कर दी अथवा सूचना उपलब्ध कराने में बाधा उत्पन्न की, तो आयोग उस अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन की दर से अधिकतम ₹25,000 तक का आर्थिक दंड लगा सकता है। इसके अतिरिक्त, धारा 20(2) के अंतर्गत संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा भी की जा सकती है।
हालाँकि, कानून का उद्देश्य प्रत्येक त्रुटि पर दंड देना नहीं है। न्याय का मूल सिद्धांत है कि दंड तभी लगाया जाए जब यह प्रमाणित हो कि अधिकारी ने दुर्भावना से कार्य किया, उपलब्ध अभिलेखों के विपरीत उत्तर दिया या जानबूझकर सत्य तथ्यों को छिपाया। इसलिए प्रत्येक मामले में सूचना आयोग तथ्यों, अभिलेखों और परिस्थितियों का स्वतंत्र परीक्षण करता है।
भारतीय न्यायपालिका ने भी सूचना के अधिकार को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार माना है। सर्वोच्च न्यायालय ने State of Uttar Pradesh v. Raj Narain (1975) में स्पष्ट किया था कि लोकतंत्र में जनता को शासन के कार्यों की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है, क्योंकि सरकार अंततः जनता के प्रति उत्तरदायी है। इसी प्रकार S.P. Gupta v. Union of India (1981) में न्यायालय ने कहा कि खुलापन (Openness) लोकतांत्रिक शासन का अनिवार्य तत्व है और गोपनीयता अपवाद होनी चाहिए, नियम नहीं।
बाद में CBSE v. Aditya Bandopadhyay (2011) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सूचना का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य पारदर्शिता और उत्तरदायित्व बढ़ाना है, किन्तु इसका प्रयोग इस प्रकार नहीं होना चाहिए कि प्रशासनिक व्यवस्था अनावश्यक रूप से बाधित हो जाए। यह निर्णय नागरिकों के अधिकार और प्रशासनिक दक्षता के बीच संतुलन स्थापित करने का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
इसी प्रकार Manohar v. State of Maharashtra (2012) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सूचना आयोगों को अधिनियम के प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए तथा जहाँ आवश्यक हो, वहाँ दंडात्मक प्रावधानों का उपयोग भी करना चाहिए। यह निर्णय इस सिद्धांत को बल देता है कि सूचना का अधिकार तभी प्रभावी होगा जब उसके उल्लंघन पर उत्तरदायित्व भी तय किया जाए।
आज अनेक मामलों में देखा जाता है कि सूचना मांगने वाले नागरिकों को गोलमोल, अधूरी या विषय से असंबंधित जानकारी देकर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है। कई बार रिकॉर्ड उपलब्ध होने के बावजूद "सूचना उपलब्ध नहीं है" कह दिया जाता है या ऐसे उत्तर दिए जाते हैं जिनसे वास्तविक तथ्य छिप जाएँ। ऐसी प्रवृत्तियाँ केवल एक व्यक्ति के अधिकारों का हनन नहीं करतीं, बल्कि पूरे सूचना तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं। यदि जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना देने वालों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई नहीं होगी, तो सूचना का अधिकार अधिनियम केवल कागज़ी अधिकार बनकर रह जाएगा।
दूसरी ओर, नागरिकों को भी यह समझना होगा कि सूचना का अधिकार प्रतिशोध का माध्यम नहीं, बल्कि जनहित और पारदर्शिता का संवैधानिक साधन है। यदि उन्हें प्राप्त सूचना गलत या भ्रामक प्रतीत होती है, तो उन्हें अभिलेखों और प्रमाणों के आधार पर प्रथम अपील, द्वितीय अपील अथवा सूचना आयोग के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करनी चाहिए। प्रमाण-आधारित आपत्ति ही न्यायिक और प्रशासनिक दृष्टि से अधिक प्रभावी होती है।
आज आवश्यकता केवल सूचना उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि सही सूचना उपलब्ध कराने की है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में शासन और जनता के बीच विश्वास का आधार सत्य, प्रमाणिक और पारदर्शी सूचना होती है। इसलिए ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ लोक सूचना अधिकारियों को संरक्षण और प्रोत्साहन मिलना चाहिए, जबकि जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना देने वालों के विरुद्ध सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20 के प्रावधानों का निष्पक्ष, प्रभावी और समयबद्ध उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यही सुशासन की पहचान, लोकतंत्र की मजबूती और विधि के शासन का वास्तविक सम्मान है।
अधिवक्ता डी.पी. जोशी
एल.एल.बी., एल.एल.एम. (क्रिमिनल लॉ)
मोबाइल नंबर : 9893354327
POCSO से बचाव — बच्चों की सुरक्षा में परिवार और कानून की भूमिका
*बच्चों को POCSO से बचाने के लिए घर में शुरू करें सुरक्षा की पहली पाठशाला'*
बच्चे को डराने की नहीं, जागरूक और विश्वासपूर्ण बनाने की जरूरत
“गलत हुआ तो बताओ, तुम्हारी गलती नहीं है”
*विशेष कानूनी जन-जागरूकता लेख*
*अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी*
*मोबाइल : 9893354327*
*बच्चे को सुरक्षित रखने की पहली जिम्मेदारी केवल कानून की किताबों में नहीं, बल्कि घर की बातचीत से शुरू होती है। बच्चों के विरुद्ध यौन अपराध एक गंभीर सामाजिक और कानूनी चुनौती हैं। ऐसे अपराधों से बच्चों को संरक्षण देने के लिए बालकों का लैंगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) लागू है।*
लेकिन अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी के अनुसार, केवल कठोर कानून बना देना पर्याप्त नहीं है। माता-पिता, शिक्षक और समाज को भी बच्चों को उनकी उम्र और समझ के अनुरूप व्यक्तिगत सुरक्षा, अनुचित व्यवहार की पहचान तथा सहायता मांगने के अधिकार के बारे में जागरूक करना होगा।
कॉलम–1 | *सुरक्षा की पहली पाठशाला*
“मेरा शरीर, मेरी सुरक्षा”
अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी कहते हैं कि बच्चों को डराकर नहीं, बल्कि विश्वास और जागरूकता के साथ सुरक्षित वातावरण देना चाहिए।
माता-पिता बच्चे की उम्र और समझ के अनुसार उसे यह समझाएं कि उसके शरीर की निजता महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यवहार उसे असहज, भयभीत या परेशान करता है तो वह “नहीं” कह सकता है, वहां से हट सकता है और किसी विश्वसनीय वयस्क को बता सकता है।
बच्चे को यह विश्वास होना चाहिए कि—
“कोई भी व्यक्ति कितना भी परिचित क्यों न हो, यदि उसका व्यवहार गलत या असहज लगे तो तुम हमें बता सकते हो।”
केवल अजनबी से सावधान करना पर्याप्त नहीं
अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी के अनुसार बच्चों को केवल यह बताना कि “अजनबी से बात मत करो” पर्याप्त सुरक्षा शिक्षा नहीं है। बच्चे के परिचित व्यक्ति का अनुचित व्यवहार भी गंभीर हो सकता है।
इसलिए बच्चों को व्यक्ति की पहचान से ज्यादा व्यवहार और परिस्थिति को पहचानना सिखाना जरूरी है।
“गुप्त बात” के नाम पर डराया जाए तो
यदि कोई व्यक्ति बच्चे को किसी ऐसी बात को छिपाने के लिए कहता है जिससे बच्चा डरता या परेशान होता है, तो उसे स्पष्ट रूप से बताया जाए कि वह बात माता-पिता या किसी विश्वसनीय व्यक्ति को बता सकता है।
धमकी, लालच या भावनात्मक दबाव बच्चे को चुप रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।
बच्चा बताए तो पहले सुनें
अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी बताते हैं कि ऐसी स्थिति में माता-पिता की पहली प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होती है।
बच्चे से कहें—
“तुमने हमें बताकर सही किया।”
“हम तुम्हारे साथ हैं।”
“जो हुआ उसके लिए तुम्हें दोषी नहीं माना जाएगा।”
बच्चे को दोष देना, शर्मिंदा करना या अनावश्यक रूप से बार-बार पूछताछ करना उचित नहीं है।
कॉलम–2 | *POCSO कानून को समझें*
18 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति ‘बालक’
POCSO अधिनियम की धारा 2(द) के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु का व्यक्ति “बालक” है।
अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी के अनुसार माता-पिता को यह समझना चाहिए कि POCSO में अपराध की कानूनी प्रकृति घटना के वास्तविक तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
इस अधिनियम में लैंगिक हमला, गंभीर लैंगिक हमला, लैंगिक उत्पीड़न तथा बालक को अश्लील उद्देश्यों के लिए उपयोग करने से संबंधित अपराधों के लिए विशेष प्रावधान हैं।
सूचना मिलने पर क्या करें?
POCSO की धारा 19 के तहत अपराध की जानकारी या आशंका होने पर निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार पुलिस अथवा विशेष किशोर पुलिस इकाई को सूचना दी जा सकती है। कानून में कुछ परिस्थितियों में सूचना न देने के संबंध में दंडात्मक प्रावधान भी हैं।
इसलिए किसी गंभीर घटना को केवल सामाजिक दबाव या बदनामी के डर से छिपाने के बजाय समय पर उचित कानूनी सलाह और कार्रवाई लेना महत्वपूर्ण है।
बच्चे की पहचान सार्वजनिक न करें
POCSO की धारा 23 बच्चे की पहचान तथा उससे संबंधित जानकारी के प्रकाशन पर महत्वपूर्ण प्रतिबंध लगाती है।
*अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी विशेष रूप से अभिभावकों से अपील करते हैं कि* POCSO मामले में बच्चे का—
नाम,
फोटो,
पता,
विद्यालय,
परिवार की पहचान,
या पहचान उजागर करने वाली अन्य जानकारी
सोशल मीडिया अथवा सार्वजनिक मंच पर साझा न करें।
बच्चे की गरिमा और निजता की रक्षा प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है।
कॉलम–3 | *मोबाइल, इंटरनेट और सामाजिक जिम्मेदारी*
डिजिटल दुनिया में बच्चों की सुरक्षा
आज बच्चों का एक बड़ा हिस्सा इंटरनेट और ऑनलाइन गेमिंग से जुड़ा है। सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के माध्यम से होने वाले संपर्क में भी सावधानी आवश्यक है।
अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी के अनुसार माता-पिता बच्चों को समझाएं—
निजी फोटो या वीडियो किसी के साथ साझा न करें।
ऑनलाइन किसी व्यक्ति के दबाव में व्यक्तिगत जानकारी न दें।
ऑनलाइन मिले व्यक्ति से अकेले मिलने न जाएं।
धमकी या ब्लैकमेल की स्थिति में तुरंत अभिभावक को बताएं।
आपत्तिजनक सामग्री को आगे प्रसारित न करें।
यदि कोई डिजिटल सामग्री किसी अपराध से संबंधित हो सकती है, तो उसे घबराहट में नष्ट या प्रसारित करने के बजाय उचित कानूनी प्रक्रिया के संबंध में सलाह लेना उचित है।
🔴 विशेष बॉक्स
*POCSO में माता-पिता क्या करें / क्या न करें*
✅ *क्या करें*
✔ बच्चे की बात शांतिपूर्वक सुनें।
✔ बच्चे को दोषी न ठहराएं।
✔ उसकी तत्काल सुरक्षा को प्राथमिकता दें।
✔ आवश्यक होने पर पुलिस/विशेष किशोर पुलिस इकाई से संपर्क करें।
✔ आवश्यकता के अनुसार चिकित्सकीय एवं मनोवैज्ञानिक सहायता लें।
✔ बच्चे की पहचान और निजता की रक्षा करें।
✔ उपलब्ध साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के लिए उचित कानूनी सलाह लें।
✔ बच्चे को न्यायिक प्रक्रिया के दौरान भावनात्मक सहयोग दें।
❌ *क्या न करें*
✘ बच्चे को घटना के लिए जिम्मेदार न ठहराएं।
✘ उसे धमकाकर या दबाव डालकर चुप न कराएं।
✘ सामाजिक बदनामी के कारण घटना छिपाने का प्रयास न करें।
✘ बच्चे की पहचान सोशल मीडिया पर सार्वजनिक न करें।
✘ फोटो/वीडियो को व्हाट्सऐप या अन्य माध्यमों से प्रसारित न करें।
✘ आरोपी से हिंसक टकराव के बजाय कानून के अनुसार कार्रवाई करें।
✘ बच्चे से अनावश्यक और बार-बार पूछताछ न करें।
⭐ *अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी की अपील*
हर माता-पिता बच्चे को ये पाँच बातें जरूर बताएं
1. तुम्हारा शरीर और तुम्हारी सुरक्षा महत्वपूर्ण है।
2. कोई व्यवहार असहज लगे तो “नहीं” कह सकते हो।
3. डराने वाली या परेशान करने वाली बात छिपाना जरूरी नहीं है।
4. परेशानी होने पर तुरंत माता-पिता या किसी भरोसेमंद वयस्क को बताओ।
5. तुम्हारे साथ अपराध होने पर तुम्हें दोषी नहीं माना जाना चाहिए।
बच्चे की चुप्पी नहीं, उसका विश्वास बचाएं
अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी कहते हैं कि बाल सुरक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार विश्वास है। यदि बच्चे को भरोसा हो कि उसके माता-पिता उसकी बात सुनेंगे, उसे दोष नहीं देंगे और उसकी सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाएंगे, तो वह कठिन परिस्थिति में समय रहते सहायता मांग सकता है।
बाल सुरक्षा की शुरुआत थाने या अदालत से पहले घर से होती है।
हर माता-पिता अपने बच्चे से यह जरूर कहें—
“तुम्हारे साथ कभी कोई गलत व्यवहार हो, चाहे वह कोई भी व्यक्ति करे, तुम बिना डरे हमें बता सकते हो। हम तुम्हारी बात सुनेंगे, तुम्हें दोष नहीं देंगे और तुम्हारी सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाएंगे।”
यही विश्वास बच्चे के लिए सबसे मजबूत सुरक्षा कवच बन सकता है।
✍️ *अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी*
मोबाइल : 9893354327
*कानूनी जागरूकता एवं जनहित लेख*
*विषय : बाल सुरक्षा एवं POCSO अधिनियम*
यह लेख सामान्य कानूनी जन-जागरूकता के उद्देश्य से है। किसी विशिष्ट मामले में घटना के तथ्यों के अनुसार योग्य विधिक सलाह लेना उचित है।
हत्या के मामले में दो आरोपी दोषमुक्त, न्यायालय तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश शैलेश शर्मा ने सुनाया फैसला
*हत्या के मामले में दो आरोपी दोषमुक्त, न्यायालय तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश शैलेश शर्मा ने सुनाया फैसला*
रायपुर, 20 अगस्त 2026। वर्ष 2024 में थाना मंदिर हसौद क्षेत्र के ग्राम बाहनाकाकुड़ी में हुई हत्या के मामले में माननीय न्यायालय तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश श्री शैलेश शर्मा द्वारा आज दिनांक 20 अगस्त 2026 को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दोनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया गया।
प्रकरण के अनुसार, दिनांक 26 नवंबर 2024 को ग्राम बाहनाकाकुड़ी के एक खाली प्लॉट के पास रमेश उर्फ फरसत को मृत अवस्था में पाए जाने की सूचना पुलिस को मिली थी। पुलिस ने मर्ग कायम कर शव का पंचनामा एवं पोस्टमार्टम कराया। विवेचना के दौरान सिर के पीछे कठोर वस्तु से चोट तथा संघर्षात्मक चोट के कारण मृत्यु होना सामने आया।
पुलिस विवेचना में संदेह के आधार पर किशन राजपूत पिता बरात राजपूत, उम्र लगभग 20 वर्ष तथा रोशन ध्रुव उर्फ शिवम पिता मधवा ध्रुव, उम्र लगभग 19 वर्ष को आरोपी बनाया गया। प्रकरण में एक अपचारी बालक का भी उल्लेख विवेचना के दौरान किया गया था। पुलिस द्वारा कथित मेमोरेंडम कथन एवं घटना में प्रयुक्त वस्तुओं की जब्ती को अभियोजन साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया।
मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देवप्रसाद जोशी, रायपुर ने प्रभावी पैरवी करते हुए अभियोजन के साक्ष्यों, बयानों तथा विवेचना में सामने आई कमियों और विरोधाभासों को न्यायालय के समक्ष प्रमुखता से रखा। बचाव पक्ष की ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि अभियोजन आरोपियों के विरुद्ध अपराध को संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल रहा।
समस्त मौखिक एवं दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण करने के पश्चात माननीय तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश श्री शैलेश शर्मा ने दिनांक 20 अगस्त 2026 को दोनों आरोपियों को आरोपों से दोषमुक्त कर दिया।
न्यायालय के इस निर्णय से दोनों आरोपियों एवं उनके परिजनों को बड़ी राहत मिली है। प्रकरण में बचाव पक्ष की ओर से *अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी*, रायपुर ने पैरवी की।
POCSO के बढ़ते मामलों को रोकने की पहली जरूरत—अपराध के बाद नहीं, अपराध से पहले जागरूकता - अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी
*POCSO के बढ़ते मामलों को रोकने की पहली जरूरत—अपराध के बाद नहीं, अपराध से पहले जागरूकता* - *अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी*
*बच्चों की सुरक्षा के लिए परिवार, स्कूल, पुलिस, प्रशासन और समाज को मिलकर बनानी होगी मजबूत व्यवस्था*
*विशेष लेख*
बच्चों के विरुद्ध यौन अपराध समाज के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक हैं। ऐसे अपराध बच्चे के शरीर को ही नहीं, बल्कि उसके मन, आत्मविश्वास और भविष्य को भी प्रभावित करते हैं। बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के उद्देश्य से POCSO Act, 2012 बनाया गया है। कानून ने बच्चों के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है, लेकिन केवल कठोर कानून और सजा के भय से ऐसे अपराधों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए अपराध की रोकथाम पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।
*बच्चा चुप नहीं, जागरूक होना चाहिए*
अपराध की रोकथाम की शुरुआत घर से होनी चाहिए। बच्चों को उनकी उम्र और समझ के अनुसार सुरक्षित एवं असुरक्षित व्यवहार की जानकारी दी जानी चाहिए। उन्हें यह विश्वास होना चाहिए कि यदि कोई व्यक्ति उनके साथ अनुचित व्यवहार करता है तो वे बिना डर के माता-पिता, शिक्षक या किसी विश्वसनीय व्यक्ति को इसकी जानकारी दे सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चे की शिकायत पर उसे डांटने या दोष देने के बजाय उसकी बात शांतिपूर्वक सुनी जाए और आवश्यकता होने पर समय पर उचित सहायता उपलब्ध कराई जाए।
*‘अजनबी से सावधान’ से आगे बढ़ना होगा*
बाल यौन अपराधों के संबंध में यह धारणा आम है कि खतरा केवल किसी अजनबी व्यक्ति से होता है। वास्तविक परिस्थितियों में बच्चा आरोपी को जानता-पहचानता भी हो सकता है। इसलिए बच्चों को केवल अजनबियों से सावधान रहने की सलाह पर्याप्त नहीं है। उन्हें अपने शरीर, निजी सीमाओं और असहज परिस्थितियों के बारे में उम्र के अनुरूप जानकारी देना आवश्यक है।
*स्कूल बनें सुरक्षित स्थान*
बच्चे अपना महत्वपूर्ण समय विद्यालय में बिताते हैं। इसलिए प्रत्येक विद्यालय में प्रभावी Child Protection Policy, कर्मचारियों का उचित सत्यापन, सुरक्षित परिसर, शिकायत की व्यवस्था तथा बच्चों के लिए नियमित जागरूकता कार्यक्रम होने चाहिए।
किसी बच्चे द्वारा गंभीर शिकायत किए जाने पर मामले को दबाने या केवल सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण चुप रहने के बजाय कानून के अनुरूप उचित कदम उठाना आवश्यक है।
*मोबाइल और इंटरनेट भी नई चुनौती*
डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा का एक बड़ा हिस्सा ऑनलाइन दुनिया से जुड़ गया है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और चैटिंग के माध्यम से बच्चों को बहलाने, धमकाने या अनुचित सामग्री साझा करने के खतरे मौजूद हैं।
अभिभावकों को बच्चों को साइबर सुरक्षा के बारे में समझाना चाहिए। बच्चों को अनजान व्यक्तियों के साथ निजी जानकारी, फोटो या वीडियो साझा करने के जोखिमों की जानकारी दी जानी चाहिए। किसी संदिग्ध ऑनलाइन गतिविधि की स्थिति में उपलब्ध डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखना और समय पर उचित प्राधिकरण को सूचना देना महत्वपूर्ण हो सकता है।
*कठोर कानून के साथ निष्पक्ष जांच भी जरूरी*
POCSO कानून बच्चों की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कानून है और इसका प्रभावी क्रियान्वयन आवश्यक है। लेकिन प्रत्येक आपराधिक मामले में निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
किसी व्यक्ति पर आरोप लगना और न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं। इसलिए जांच एजेंसियों को मौखिक, चिकित्सकीय, दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का निष्पक्ष एवं वैज्ञानिक परीक्षण करना चाहिए। वास्तविक पीड़ित बच्चे को न्याय मिलना चाहिए और निर्दोष व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी नहीं माना जाना चाहिए।
*समाज की चुप्पी अपराध को बढ़ावा दे सकती है*
सामाजिक बदनामी के डर से बाल यौन अपराधों को छिपाना समस्या को और गंभीर बना सकता है। यदि किसी बच्चे के साथ अपराध हुआ है तो परिवार को समय पर कानूनी, चिकित्सकीय और मनोवैज्ञानिक सहायता लेनी चाहिए।
साथ ही मीडिया और सोशल मीडिया को भी अत्यंत संवेदनशीलता बरतनी चाहिए। बच्चे की पहचान और निजता की रक्षा करना आवश्यक है। किसी लंबित मामले में बिना न्यायिक निष्कर्ष के किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से दोषी घोषित करना भी उचित नहीं है।
*रोकथाम के लिए सामूहिक अभियान की आवश्यकता*
POCSO मामलों की रोकथाम के लिए जिला स्तर पर पुलिस, विद्यालयों, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, बाल संरक्षण इकाइयों, चिकित्सकों और सामाजिक संगठनों के सहयोग से नियमित Child Safety Awareness Campaign चलाए जाने चाहिए।
हमें केवल यह प्रश्न नहीं पूछना चाहिए कि अपराध होने के बाद दोषी को कितनी सजा मिलेगी; हमें यह भी पूछना होगा कि अपराध होने से पहले बच्चे को कैसे सुरक्षित रखा जाए।
बच्चों को जागरूक करना, परिवार में संवाद बढ़ाना, विद्यालयों को सुरक्षित बनाना, इंटरनेट के सुरक्षित उपयोग की शिक्षा देना और शिकायत मिलने पर कानून के अनुरूप तत्काल एवं निष्पक्ष कार्रवाई करना—ये सभी कदम मिलकर बाल यौन अपराधों की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
*सुरक्षित बचपन ही सुरक्षित समाज की पहचान है। POCSO कानून न्याय का महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन जागरूक और जिम्मेदार समाज अपराध की रोकथाम की सबसे मजबूत दीवार है।*
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*अधिवक्ता, देव प्रसाद जोशी*
*सेशन कोर्ट, रायपुर, छत्तीसगढ़*
*मो.: 9893354327*
ADVOCATE DP JOSHI RAIPUR
The Bharat "द भारत"
पुलिसकर्मियों के मानवाधिकार : वर्दी के भीतर के इंसान की गरिमा, श्रम और सेवा-अधिकार — Advocate D.P. Joshi
Image Generated by AI पुलिसकर्मियों के मानवाधिकार : वर्दी के भीतर के इंसान की गरिमा, श्रम और सेवा-अधिकार — Advocate D.P. Joshi पुलिस बल किसी...




